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शिक्षा : एआई के युग में शिक्षक : मशीन से आगे, मानवीय सृजन तक

Abhyuday Bharat News / Sun, Oct 4, 2026 / Post views : 338

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जब मशीनें उत्तर देने लगी हैं, तब शिक्षक का काम केवल उत्तर देना नहीं, बल्कि सही प्रश्न तक पहुँचाना है

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

(Educationist, DMIT Expert and Psychometric Councellor)

कक्षा में एक बच्चा हाथ उठाता है। वह कभी साधारण कभी कठिन प्रश्न पूछता, लेकिन उसके पीछे उसकी उलझन बड़ी होती है। कभी वह इसलिए पूछता है क्योंकि उसे सचमुच जानना है और कभी इसलिए क्योंकि वह डर रहा होता है कि कहीं उसका उत्तर गलत न निकल जाए। एक अनुभवी शिक्षक इन दोनों स्थितियों में अंतर समझ लेता है।

यही कक्षा अब धीरे धीरे बदल रही है। बच्चे के हाथ में किताब के साथ मोबाइल है। उसके सामने इंटरनेट है और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) भी है। वह कुछ ही क्षणों में किसी विषय की जानकारी पा सकता है, कठिन प्रश्न का उत्तर पूछ सकता है, किसी विषय को सरल भाषा में समझ सकता है और अपने विचार को लिखने में भी सहायता ले सकता है।

ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक है कि जब मशीन इतनी जल्दी उत्तर दे सकती है, तो शिक्षक की जरूरत क्यों रहेगी?इस सवाल का उत्तर शायद किसी तकनीकी तर्क में नहीं, बल्कि उसी कक्षा में छिपा है। क्योंकि शिक्षा केवल उत्तर पाने का नाम नहीं है।

1. एआई का आगमन : शिक्षक की भूमिका का अंत नहीं, विस्तार

शिक्षा में नई तकनीक का आना कोई नई घटना नहीं है। कभी रेडियो, टेलीविजन नई तकनीक था, फिर कंप्यूटर आया और अब स्मार्ट कक्षा आ गई। हर बार यह आशंका भी उठी कि अब शिक्षक की भूमिका कम हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कारण सरल है। उपकरण बदलते रहे, सीखने वाला मनुष्य वही रहा।

एआई भी एक शक्तिशाली उपकरण है। वह शिक्षक के लिए पाठ योजना का प्रारूप तैयार कर सकती है, किसी कठिन विषय के अलग अलग उदाहरण दे सकती है, अभ्यास पत्र बनाने में मदद कर सकती है और विद्यार्थियों की अलग अलग सीखने की जरूरतों के अनुसार सामग्री के प्रारूप सुझा सकती है।

लेकिन इन सबके बीच एक सवाल बचा रहता है कि इनमें से मेरे विद्यार्थियों के लिए वास्तव में उपयोगी क्या है? यहीं शिक्षक की भूमिका शुरू होती है।

यूनेस्को के शिक्षकों के लिए एआई दक्षता रूपरेखा में भी शिक्षक की एआई दक्षताओं को केवल तकनीकी कौशल तक सीमित नहीं रखा गया है। इसमें मानव केंद्रित दृष्टिकोण, नैतिकता, एआई की समझ, एआई आधारित शिक्षाशास्त्र और शिक्षक के व्यावसायिक विकास को महत्त्व दिया गया है। इन दक्षताओं की प्रगति अर्जित करना, गहन समझ विकसित करना और सृजन करना के स्तरों में समझाई गई है।

अर्थात आने वाले समय में अच्छा शिक्षक वह नहीं होगा जो केवल सबसे अधिक एआई उपकरण जानता हो। अधिक महत्त्वपूर्ण यह होगा कि वह किस उपकरण का उपयोग कब और क्यों करे, यह समझता हो।

2. उपकरण नहीं, उद्देश्य पहले :

तकनीक अक्सर हमें अपने आकर्षण में खींच लेती है। नया उपकरण आया नहीं कि हम सोचने लगते हैं कि इसे कक्षा में कैसे इस्तेमाल करें?

शायद सवाल उलटा होना चाहिए। पहले यह तय हो कि बच्चे को क्या सीखना है, फिर यह देखा जाए कि तकनीक उसकी मदद कैसे कर सकती है।

मान लीजिए विद्यार्थियों को जल संरक्षण समझाना है। एआई से सुंदर प्रस्तुति बन सकती है, चित्र मिल सकते हैं और गतिविधि का प्रारूप तैयार हो सकता है। लेकिन यदि शिक्षक बच्चों को अपने ही गाँव या मोहल्ले के सूखते कुएँ, घटते भूजल या पानी की बर्बादी के उदाहरण से जोड़ देता है, तो सीखने का अर्थ बदल जाता है।

तकनीक वहाँ सहायक है जहां शिक्षक सीखने का अनुभव रचता है। इसीलिए एआई से तैयार सामग्री को बिना देखे कक्षा में ले जाना उचित नहीं होगा। शिक्षक को देखना होगा कि तथ्य सही हैं या नहीं, भाषा बच्चों के स्तर की है या नहीं, उदाहरण उनके परिवेश से जुड़ते हैं या नहीं और सामग्री वास्तव में सीखने में मदद करेगी या केवल आकर्षक दिखाई देगी।

उपकरण उद्देश्य के बाद आए, उद्देश्य उपकरण के बाद नहीं।

3. सूचना बहुत है, विवेक कहाँ है? :

आज बच्चे के सामने जानकारी की कमी नहीं है। असली समस्या कई बार यह है कि इतनी सारी जानकारी में से भरोसा किस पर किया जाए।

एआई एक प्रश्न का बहुत आत्मविश्वास से उत्तर दे सकती है। लेकिन आत्मविश्वास और सत्य एक ही चीज नहीं हैं। इसलिए आने वाले समय में शिक्षक को विद्यार्थियों से केवल यह नहीं पूछना होगा कि तुम्हें उत्तर मिला?

उसे यह भी पूछना होगा कि तुम्हें कैसे पता कि यह उत्तर सही है? यही छोटा सा प्रश्न शिक्षा को नई दिशा दे सकता है।

विद्यार्थी को स्रोत देखना होगा, अलग अलग सूचनाओं की तुलना करनी होगी, प्रमाण तलाशना होगा और यह समझना होगा कि किसी उत्तर का संदर्भ क्या है। उसे यह भी सीखना होगा कि हर प्रश्न का उत्तर मशीन से लेना जरूरी नहीं है।

कभी कभी किसी प्रश्न पर कुछ देर चुप रहना और स्वयं सोचना भी सीखने का हिस्सा है। जिस समय उत्तर आसानी से मिल जाएँ, उस समय सही प्रश्न पूछना और भी बड़ी क्षमता बन जाता है।

4. एक उद्देश्य, एक उपयुक्त एआई उपकरण :

एआई के क्षेत्र में हर दिन नए उपकरण सामने आ रहे हैं। ऐसे में शिक्षक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न शायद यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा एआई टूल सबसे अच्छा है?

पहला प्रश्न होना चाहिए मेरे विद्यार्थियों को अभी क्या सीखना है? और उसके बाद इस सीखने में AI कहाँ उपयोगी हो सकता है?

पाठ योजना और शिक्षण सामग्री की प्रारंभिक तैयारी में चैटजीपीटी जैसे संवादात्मक एआई उपकरण शिक्षक की सहायता कर सकते हैं। दृश्य सामग्री और प्रस्तुतीकरण के लिए कैनवा जैसे एआई सक्षम रचनात्मक उपकरण उपयोगी हो सकते हैं।

वहीं गूगल के अनुसार नोटबुकएलएम उपलब्ध स्रोतों के आधार पर सारांश, प्रश्न, अध्ययन सहायता और अन्य सामग्री तैयार करने में मदद कर सकता है।

इससे एक उपयोगी शिक्षण दृष्टि सामने आती है

उपकरण उद्देश्य के बाद आए, उद्देश्य उपकरण के बाद नहीं।

यदि पाठ की अवधारणा स्पष्ट करनी है, तो संवादात्मक एआई उपयोगी हो सकता है।

यदि उपलब्ध दस्तावेजों से अध्ययन करना है, तो स्रोत आधारित उपकरण अधिक उपयुक्त हो सकते हैं। यदि दृश्य प्रस्तुतीकरण चाहिए, तो दृश्यात्मक कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण मदद कर सकते हैं। यदि अभ्यास या प्रश्न निर्माण करना है, तो एआई-सक्षम मूल्यांकन उपकरण समय बचा सकते हैं।

लेकिन किसी भी उपकरण का उपयोग तभी सार्थक है जब वह सीखने के उद्देश्य को मजबूत करे।

4. शिक्षक : ज्ञानदाता से सीखने के सहयात्री तक

एक विद्यार्थी गलत उत्तर देता है। मशीन शायद कहेगी यह उत्तर सही नहीं है। शिक्षक शायद पूछेगा कि तुमने ऐसा क्यों सोचा? इन दोनों वाक्यों के बीच शिक्षा का एक पूरा संसार छिपा है।

दूसरा प्रश्न विद्यार्थी को अपनी सोच पर लौटाता है। वह अपनी गलती को देखने लगता है। उसे समझ आता है कि कहाँ उसकी समझ अधूरी थी। यही प्रक्रिया धीरे धीरे आत्मविश्वास और स्वतंत्र चिंतन पैदा करती है।

शिक्षक विद्यार्थी की आँखों में दिखाई देने वाली उलझन पढ़ता है। वह समझता है कि कौन बच्चा उत्तर जानते हुए भी हाथ नहीं उठा रहा है और कौन बच्चा केवल दूसरों को देखकर उत्तर दे रहा है।

किसी बच्चे को एक अतिरिक्त अवसर चाहिए, किसी को थोड़ी सख्ती और किसी को केवल यह भरोसा कि तुम कर सकते हो।

यह काम किसी डिजिटल प्रणाली के निर्देशों से पूरी तरह नहीं हो सकता। मशीन उत्तर देख सकती है; शिक्षक उस उत्तर के पीछे की सोच और विद्यार्थी के मौन को समझने की कोशिश करता है। यही शिक्षा का मानवीय पक्ष है।

5. एआई : विकल्प नहीं, शिक्षक की क्षमता का विस्तार

शिक्षक का काफी समय ऐसे कामों में चला जाता है जो आवश्यक तो हैं, लेकिन बार बार करने पड़ते हैं। सामग्री का प्रारूप बनाना, अभ्यास पत्र तैयार करना, अलग अलग स्तर के प्रश्न सोचना या किसी विषय को दूसरी भाषा और दूसरे उदाहरणों में प्रस्तुत करना जिनमें एआई सहयोग कर सकती है।

यदि इस सहयोग से शिक्षक का कुछ समय बचता है, तो उस समय का सबसे अच्छा उपयोग क्या होगा? और अधिक स्क्रीन? शायद नहीं।

वह समय विद्यार्थियों से बात करने, उनकी कॉपियाँ देखने, उनकी कठिनाइयाँ समझने, प्रयोग कराने, चर्चा करने और उन बच्चों तक पहुँचने में लगाया जा सकता है जो कक्षा में पीछे छूट रहे हैं।

यहीं एआई का वास्तविक शैक्षिक मूल्य दिखाई देता है।

एआई शिक्षक का स्थान लेने के बजाय शिक्षक को उसके सबसे मानवीय काम के लिए अधिक समय दे तो तकनीक का उपयोग सार्थक कहा जा सकता है।

6. तकनीक की शक्ति, नैतिक विवेक की जरूरत :

एआई जितनी उपयोगी है, उतने ही कुछ प्रश्न भी उसके साथ आते हैं। विद्यार्थियों की व्यक्तिगत जानकारी कहाँ जा रही है? किसी एआई प्रणाली द्वारा दिया गया उत्तर कितना विश्वसनीय है? उसमें पक्षपात तो नहीं? क्या बच्चा हर उत्तर के लिए मशीन पर निर्भर होता जा रहा है? क्या उसकी अपनी सोच धीरे‌ धीरे कमजोर पड़ रही है?

इन प्रश्नों को नजरअंदाज करके एआई को कक्षा में ले आना उचित नहीं होगा। बच्चों को यह भी सिखाना होगा कि हर उपलब्ध तकनीक का उपयोग करना आवश्यक नहीं है।

डिजिटल दुनिया में एक जिम्मेदार नागरिक वही है जो यह जानता है कि जानकारी कैसे प्राप्त करनी है, लेकिन यह भी जानता है कि अपनी निजी जानकारी कहाँ साझा नहीं करनी है; जो तकनीक का उपयोग करता है, लेकिन अपनी सोच को उसके हवाले नहीं करता।

इसलिए एआई साक्षरता केवल तकनीक चलाने की दक्षता नहीं है। यह तकनीक के साथ जिम्मेदारी से जीने की समझ भी है।

7. एआई और समानता : क्या हर विद्यार्थी को समान अवसर मिलेगा?

एक और प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है। क्या एआई का लाभ हर बच्चे तक समान रूप से पहुँचेगा? शहर के किसी विद्यार्थी के पास तेज इंटरनेट, व्यक्तिगत उपकरण और डिजिटल सहायता हो सकती है। दूसरी ओर, किसी ग्रामीण या दूरस्थ क्षेत्र के विद्यार्थी के पास सीमित संसाधन हो सकते हैं।

यदि एआई शिक्षा का हिस्सा बन रही है, तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि तकनीक, सुविधा और अवसर के बीच नई दीवार न खड़ी करे।

शिक्षा में तकनीक का अर्थ केवल अधिक उपकरण उपलब्ध कराना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि जिस बच्चे के पास कम है, उसके सीखने के अवसर कम न हों।

यहीं से एआई की चर्चा तकनीक से निकलकर सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न बन जाती है।

8. भविष्य की कक्षा : अधिक तकनीकी, अधिक मानवीय

भविष्य की कक्षा शायद आज से अधिक डिजिटल होगी। लेकिन जरूरी नहीं कि वह आज से अधिक मानवीय भी हो। यह हमारे निर्णय पर निर्भर करेगा।

एक कक्षा में बहुत सारी स्क्रीन हो सकती हैं, लेकिन यदि बच्चे प्रश्न पूछना भूल जाएँ, एक दूसरे से बात न करें और हर उत्तर के लिए मशीन की ओर देखें, तो वह कक्षा कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, सीखने की दृष्टि से अधूरी रह जाएगी।

इसके विपरीत, एक ऐसी कक्षा जहाँ तकनीक आवश्यकता के अनुसार इस्तेमाल हो, विद्यार्थी चर्चा करें, तर्क करें, प्रयोग करें, गलती करें, सुधारें और अपने विचार व्यक्त करें वही भविष्य की सार्थक कक्षा होगी।

स्मार्ट कक्षा वह नहीं जहाँ मशीनें अधिक हों; स्मार्ट कक्षा वह है जहाँ सीखना अधिक जीवंत हो।

9. शिक्षक की नई दक्षता : प्रॉम्प्ट से आगे, शिक्षाशास्त्र तक

एआई के साथ काम करने के लिए अच्छा प्रॉम्प्ट लिखना उपयोगी है। लेकिन शिक्षक का काम केवल प्रॉम्प्ट लिखना सीख लेना नहीं है।

उसे यह समझना होगा कि किसी विशेष सीखने के उद्देश्य के लिए एआई का उपयोग कब करना है और कब नहीं करना है।

कब एआई से उदाहरण माँगना है।

कब विद्यार्थी को स्वयं उदाहरण खोजने देना है।

कब एआई के उत्तर की जाँच करनी है।

कब बच्चे को उत्तर देने के बजाय प्रश्नों की श्रृंखला देनी है।

और कब तकनीक को एक ओर रखकर विद्यार्थी के साथ आमने सामने बैठना है।

यही शिक्षाशास्त्रीय एआई साक्षरता है। आने वाले समय में शिक्षक की असली दक्षता यह नहीं होगी कि वह कितने एआई उपकरणों के नाम जानता है, बल्कि यह कि वह तकनीक को सीखने के उद्देश्य से कितनी समझदारी से जोड़ पाता है।

10. सूचना से समझ, समझ से विवेक, विवेक से सृजन

शिक्षा का अंतिम लक्ष्य जानकारी इकट्ठी करना नहीं है।यदि बच्चा किसी प्रश्न का उत्तर इंटरनेट या एआई से खोज सकता है, तो शिक्षा को उससे एक कदम आगे जाना होगा।

उसे पूछना होगा कि अब इस जानकारी का तुम क्या करोगे? यहीं सूचना समझ में बदलती है। समझ से विवेक पैदा होता है और विवेक से सृजन।

एक बच्चा यदि जल संकट के बारे में जानकारी खोजता है, तो यह पहला चरण है। यदि वह अपने क्षेत्र की स्थिति समझता है, तो यह दूसरा चरण है। यदि वह तय करता है कि पानी बचाने के लिए क्या किया जा सकता है, तो यह विवेक है। और यदि वह उसके लिए कोई नया समाधान तैयार करता है, तो वह सृजन है।

एआई इन चरणों में सहायता कर सकती है, लेकिन सृजन की जिम्मेदारी और अर्थ मनुष्य के पास ही रहना चाहिए।

11. तकनीक की शक्ति, मनुष्य का उद्देश्य :

शायद आने वाले वर्षों में यह प्रश्न कम महत्त्वपूर्ण हो जाएगा कि एआई कितने काम कर सकती है। अधिक महत्त्वपूर्ण यह होगा कि हम उससे कौन से काम करवाना चाहते हैं और कौन से काम अपने पास रखना चाहते हैं।

हम मशीन से उत्तर ले सकते हैं, लेकिन प्रश्न पूछने की आदत बचाए रखनी होगी। हम मशीन से सामग्री बनवा सकते हैं, लेकिन विचार अपना होना चाहिए।

हम मशीन से कठिन अवधारणा समझ सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय में अपना विवेक होना चाहिए। और सबसे बढ़कर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शिक्षा का केंद्र तकनीक नहीं, मनुष्य है।

शिक्षक का भविष्य मशीन से मुकाबला करने में नहीं है। उसका भविष्य उस समय में है जो मशीन बचाएगी, उस समय को विद्यार्थी के लिए संवाद, संवेदना, चिंतन और सृजन में बदलने में है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि क्या एआई शिक्षक की जगह ले लेगी? शायद अधिक सार्थक प्रश्न यह है कि क्या हम एआई की सहायता से शिक्षक को उसके सबसे मानवीय काम के लिए और अधिक समय दे पाएँगे?

यदि उत्तर हाँ की दिशा में जाता है, तो एआई शिक्षा का अंत नहीं, एक नई शुरुआत हो सकती है। क्योंकि शिक्षा की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि मशीन ने कितने उत्तर दिए।

सफलता तब होगी, जब उन उत्तरों के बाद कोई विद्यार्थी कुछ नया सोचने, कुछ बेहतर समझने और कुछ अपना रचने लगे। और शायद यही वह जगह है जहाँ शिक्षक आज भी मशीन से आगे है वह केवल उत्तर नहीं देता, वह सीखने की रोशनी जलाता है।

12. संदर्भ-स्रोत :

शिक्षकों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता दक्षता रूपरेखा यूनेस्को 2024।

शिक्षा और अनुसंधान में जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग हेतु मार्गदर्शिका यूनेस्को 2023।

विद्यार्थियों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता दक्षता रूपरेखा यूनेस्को 2024।

शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा अधिगम के भविष्य से संबंधित मार्गदर्शिकाएँ एवं अध्ययन यूनेस्को।

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