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मुंगेली न्यूज़ : मदकू द्वीप के प्राचीन मंदिरों पर बंदरों का बढ़ता खतरा, संरक्षण की मांग तेज

Abhyuday Bharat News / Tue, Jun 23, 2026 / Post views : 238

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सरगांव- मुंगेली जिले के प्रसिद्ध पुरातात्विक एवं धार्मिक पर्यटन स्थल मदकू द्वीप में उत्खनन से प्राप्त प्राचीन मंदिरों और ऐतिहासिक अवशेषों के संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। क्षेत्र के जागरूक नागरिकों एवं धरोहर प्रेमियों ने प्रशासन का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए कहा है कि द्वीप में बंदरों की लगातार बढ़ती संख्या के कारण यहां स्थित प्राचीन मंदिरों और पुरातात्विक संरचनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचने की आशंका उत्पन्न हो गई है।

मदकू द्वीप छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है। यहां पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में प्राचीन मंदिरों, मूर्तियों तथा स्थापत्य अवशेषों का अनावरण हुआ है, जो प्रदेश के गौरवशाली इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के साक्ष्य हैं। इन धरोहरों को देखने एवं दर्शन करने के लिए प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक, शोधार्थी और श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार वर्तमान में द्वीप परिसर में बंदरों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। बंदरों के झुंड दिनभर उत्खनन से प्राप्त प्राचीन मंदिरों, शिलाखंडों और संरक्षित अवशेषों के ऊपर उछल-कूद करते रहते हैं। कई बार वे आपस में लड़ते-झगड़ते हुए मंदिरों की दीवारों, स्तंभों और नक्काशीदार पत्थरों पर चढ़ जाते हैं, जिससे इन पुरातात्विक संरचनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

धरोहर संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि ये मंदिर और संरचनाएं सदियों पुराने पत्थरों से निर्मित हैं। समय के प्रभाव और प्राकृतिक क्षरण के बाद अब ये अवशेष अत्यंत संवेदनशील अवस्था में हैं। ऐसे में बंदरों की निरंतर गतिविधियों के कारण पत्थरों का क्षरण तेज हो रहा है तथा कई स्थानों पर टूट-फूट की स्थिति भी दिखाई देने लगी है। यदि समय रहते उचित संरक्षण उपाय नहीं किए गए तो भविष्य में इन बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

केवल धरोहरों की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि पर्यटकों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। कई बार बंदरों के झुंड अचानक लोगों के पास पहुंच जाते हैं, जिससे भय और असुविधा की स्थिति उत्पन्न होती है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक मानी जा रही है।

इस संबंध में प्रशासन से मांग की गई है कि वन विभाग और पुरातत्व विभाग के संयुक्त प्रयासों से बंदरों को सुरक्षित एवं वैज्ञानिक तरीके से किसी उपयुक्त वन क्षेत्र में स्थानांतरित करने की योजना बनाई जाए। साथ ही, उत्खनित मंदिरों और अन्य पुरातात्विक अवशेषों के चारों ओर जालीदार सुरक्षा घेरा अथवा अन्य प्रभावी सुरक्षात्मक संरचनाएं स्थापित की जाएं, ताकि बंदरों एवं अन्य जानवरों की पहुंच इन ऐतिहासिक धरोहरों तक न हो सके।

इसके अतिरिक्त धरोहरों की नियमित निगरानी और सुरक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करने की भी मांग उठाई गई है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि मदकू द्वीप केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र है। इसलिए इसकी सुरक्षा और संरक्षण सरकार, प्रशासन तथा समाज सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। मदकू द्वीप के सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास के लिए साढ़े तीन दशक से कार्य कर रही श्री हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप सेवा समिति मदकू के पदाधिकारियों ने आशा व्यक्त की है कि प्रशासन इस गंभीर विषय को प्राथमिकता से लेते हुए शीघ्र आवश्यक कदम उठाएगा, ताकि मदकू द्वीप की अमूल्य पुरातात्विक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखी जा सके।

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