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शिक्षा : जब विद्यार्थी सिर्फ सीखें नहीं, कुछ नया रचें

Abhyuday Bharat News / Tue, Sep 1, 2026 / Post views : 351

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रटने से रचने तक : एआई के दौर में कक्षा, शिक्षक और विद्यार्थी की बदलती भूमिका

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

शिक्षा-विचारक, मनोमितीय परामर्शदाता एवं बहु बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ

कक्षा में शिक्षक ने पूछा, पानी बचाने के तीन उपाय बताइए। कई हाथ उठे। विद्यार्थियों ने पाठ्यपुस्तक में पढ़े उत्तर दोहरा दिए।

फिर शिक्षक ने प्रश्न बदल दिया, यदि आपके विद्यालय में अगले महीने पानी की कमी हो जाए, तो आप पानी बचाने की ऐसी कौन सी योजना बनाएँगे, जिसे पूरा विद्यालय अपना सके?

अब कक्षा में केवल उत्तर नहीं थे। वहाँ विचार थे, तर्क थे, असहमति थी, प्रयोग की कल्पना थी और समाधान खोजने की बेचैनी थी। यहीं पढ़ाई और सीखने के बीच का अंतर दिखाई देता है।

पहले प्रश्न का उत्तर विद्यार्थी याद कर सकता है। दूसरे प्रश्न का उत्तर उसे सोचना, कल्पना करना, निर्णय लेना और कुछ नया रचना सिखाता है।

और शायद आज की शिक्षा के सामने यही सबसे बड़ा प्रश्न है, क्या हम विद्यार्थियों को केवल सही उत्तर देने के लिए तैयार कर रहे हैं, या उन्हें ऐसे प्रश्न पूछने के लिए भी तैयार कर रहे हैं जिनके उत्तर अभी किसी किताब में नहीं हैं?

1. सूचना बहुत है, पर सोच कितनी है? :

आज सूचना दुर्लभ संसाधन नहीं रही। इंटरनेट, डिजिटल माध्यमों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में किसी तथ्य, परिभाषा या सामान्य उत्तर तक पहुँचना पहले से कहीं आसान है। लेकिन सूचना और बुद्धिमत्ता एक नहीं हैं।

किसी विद्यार्थी को यह पता हो कि जल प्रदूषण क्या है, यह एक बात है; लेकिन वह अपने समुदाय में जल प्रदूषण की समस्या पहचानकर उसका समाधान सुझा सके यह दूसरी बात है। यहीं शिक्षा को ज्ञान संचरण से आगे बढ़कर सृजनात्मक चिंतन की ओर जाना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा विद्यालयी शिक्षा 2023 की दिशा विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, जिज्ञासा और समस्या समाधान जैसी क्षमताओं के विकास की ओर है।

इसलिए आज शिक्षा का मंत्र केवल जानो नहीं हो सकता।

उसे कहना होगा जानो, सोचो, प्रश्न करो, प्रयोग करो और रचो।

2. रटने से रचने तक :

शिक्षा में सही उत्तर लंबे समय से सफलता का प्रमुख प्रमाण रहा है। परीक्षा में सही उत्तर के लिए अंक मिलते हैं; लेकिन वास्तविक जीवन में हर समस्या का उत्तर पहले से उपलब्ध नहीं होता।

वहाँ परिस्थितियाँ बदलती हैं, प्रश्न बदलते हैं और समाधान भी बदलते हैं। इसीलिए विद्यार्थी को केवल यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि उत्तर क्या है?, बल्कि यह भी कि

तुम ऐसा क्यों सोचते हो?

क्या इसका कोई दूसरा तरीका हो सकता है?

यदि तुम्हारा पहला समाधान काम न करे तो?

यही प्रश्न स्मृति को चिंतन में और चिंतन को सृजन में बदलते हैं। जिस कक्षा में केवल उत्तर मिलते हैं, वहाँ ज्ञान बढ़ता है; जिस कक्षा में नए प्रश्न जन्म लेते हैं, वहाँ भविष्य आकार लेता है।

2. क्यों? पूछने वाला बच्चा :

कक्षा में बार-बार क्यों? पूछने वाला बच्चा कभी कभी शिक्षक के लिए चुनौती बन जाता है। लेकिन वही जिज्ञासा भविष्य के शोधकर्ता, वैज्ञानिक, डिजाइनर, उद्यमी या सामाजिक नवाचारी की पहली सीढ़ी हो सकती है।

इसलिए जिज्ञासा को अनुशासन की समस्या मानने के बजाय सीखने की ऊर्जा के रूप में देखना होगा। यदि विद्यार्थी पूछता है

पेड़ की पत्तियाँ हरी क्यों होती हैं?

क्या बिना मिट्टी के पौधा उगाया जा सकता है?

क्या विद्यालय की छत से वर्षाजल बचाया जा सकता है?

तो उसके प्रश्न को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित करने के बजाय खोज का अवसर दिया जाना चाहिए। क्योंकि नवाचार अक्सर किसी तैयार उत्तर से नहीं, एक अच्छे प्रश्न से शुरू होता है।

3. गलती से सीखना, असफलता से आगे बढ़ना :

सृजन के लिए केवल कल्पना पर्याप्त नहीं; असफल होने का साहस भी चाहिए।

यदि विद्यार्थी को लगता है कि गलत उत्तर पर उसका उपहास होगा, तो वह प्रयोग करने से बचेगा। वह सुरक्षित उत्तर चुनेगा नया रास्ता नहीं। इसलिए विद्यालय में गलती के प्रति दृष्टिकोण बदलना होगा।

गलत उत्तर हमेशा असफल विद्यार्थी का प्रमाण नहीं होता। वह यह भी बता सकता है कि विद्यार्थी किसी अवधारणा को किस तरह समझ रहा है।

एक असफल नमूना, गलत अनुमान या अधूरा प्रयोग यदि उस पर चर्चा, प्रतिक्रिया और संशोधन हो तो वह सीखने का शक्तिशाली अवसर बन सकता है।

प्रयास → प्रतिक्रिया → संशोधन → पुनःप्रयोग

यही नवाचार की वास्तविक प्रयोगशाला है।

4. शिक्षक : उत्तर से आगे, संभावना तक

सृजनात्मक शिक्षा में शिक्षक की भूमिका कम नहीं होती; वह और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक को हर प्रश्न का उत्तर तुरंत देने के बजाय कभी-कभी प्रश्न को वापस विद्यार्थी की ओर मोड़ना होगा

तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?

इसे जाँचने के लिए क्या कर सकते हो?

क्या कोई दूसरा समाधान हो सकता है?

इस तरह शिक्षक सूचना का अंतिम स्रोत नहीं रहता; वह जिज्ञासा का मार्गदर्शक बन जाता है।

श्रेष्ठ शिक्षक वह नहीं जो हर प्रश्न का उत्तर दे दे; वह है जो विद्यार्थी को अपना उत्तर खोजने का आत्मविश्वास दे। यही बदलाव कक्षा को शिक्षक केंद्रित व्यवस्था से विद्यार्थी केंद्रित अधिगम के अनुभव में बदल सकता है।

5. नवाचार के लिए बड़ी प्रयोगशाला नहीं, बड़ी दृष्टि चाहिए :

नवाचार का अर्थ केवल रोबोट, कोडिंग या अत्याधुनिक प्रयोगशाला नहीं है। एक खाली बोतल, गत्ते का टुकड़ा, मिट्टी, अनुपयोगी वस्तुएँ, विद्यालय का बगीचा, स्थानीय संसाधन या आसपास की कोई वास्तविक समस्या भी नवाचार का प्रारंभिक बिंदु बन सकती है।

मान लीजिए विद्यार्थियों से पूछा जाए , विद्यालय में प्रतिदिन कितना पानी व्यर्थ जाता है? वे अनुमान लगा सकते हैं, आँकड़े एकत्र कर सकते हैं, गणना कर सकते हैं, कारण खोज सकते हैं, समाधान की रूपरेखा बना सकते हैं और उसका परीक्षण कर सकते हैं।

एक ही गतिविधि में गणित, विज्ञान, पर्यावरण, भाषा, डिजिटल कौशल और सामाजिक जिम्मेदारी एक साथ आ सकते हैं। यही अनुभवात्मक और अंतर्विषयक अधिगम की शक्ति है।

6. स्थानीय समस्या से वैश्विक समाधान तक :

नवाचार को केवल तकनीक से जोड़ना सीमित दृष्टि होगी। गाँव की जल व्यवस्था, स्थानीय कृषि, पारंपरिक हस्तशिल्प, लोककला, जैव विविधता, अपशिष्ट प्रबंधन, ऊर्जा की बचत और समुदाय की समस्याएँ ये सभी विद्यार्थियों के लिए जीवंत शोध विषय बन सकते हैं।

किसी स्थानीय समस्या को ध्यान से देखना और उसके लिए बेहतर समाधान खोजने की कोशिश करना ही नवाचार की पहली सीढ़ी है।

बच्चों से पूछा जा सकता है तुम्हारे आसपास ऐसी कौन सी समस्या है जिसे तुम बदलना चाहते हो?

इस एक प्रश्न से विद्यालय की चारदीवारी समुदाय से जुड़ सकती है। यहीं विद्यार्थी केवल पाठ्यक्रम का उपभोक्ता नहीं रहता; वह अपने समाज का सक्रिय सह-निर्माता बनना शुरू करता है।

7. एआई : उत्तर नहीं, सृजन का सहचर :

कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षा के लिए अवसर भी है और चुनौती भी।

विद्यार्थी एआई से उत्तर प्राप्त कर सकता है, प्रारूप तैयार कर सकता है या किसी परियोजना के लिए विचार जुटा सकता है। लेकिन यदि वह तैयार सामग्री को बिना जाँच और विचार के स्वीकार कर लेता है, तो तकनीक उसकी सोच को विस्तार देने के बजाय उसकी निर्भरता बढ़ा सकती है।

इसके विपरीत एआई का उपयोग

विभिन्न विचारों की तुलना करने,

संभावित समाधान खोजने,

किसी प्रारूप की कमजोरियाँ पहचानने,

आँकड़ों को समझने,

किसी विचार पर प्रतिक्रिया लेने और

अपने समाधान को बेहतर बनाने

के लिए किया जा सकता है।

यूनेस्को का विद्यार्थियों के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता दक्षता ढाँचा में विद्यार्थियों को जिम्मेदार और रचनात्मक सह-सृजक के रूप में तैयार करने पर बल दिया गया है।

इसलिए भविष्य की शिक्षा में प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थी एआई का उपयोग करता है या नहीं? बल्कि यह होना चाहिए विद्यार्थी एआई का उपयोग अपनी सोच को कमजोर करने के लिए कर रहा है या उसे बेहतर बनाने के लिए?

एआई विद्यार्थी की सोच का विकल्प नहीं; वह उसकी सोच को विस्तार देने वाला साधन होना चाहिए।

8. मूल्यांकन : उत्तर से आगे, सोच की पड़ताल

यदि विद्यार्थी का मूल्यांकन केवल एक सही उत्तर के आधार पर होगा, तो हम उससे मौलिकता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? नवाचार उन्मुख मूल्यांकन में यह भी देखा जाना चाहिए

समस्या उसने कैसे पहचानी?

कितने विकल्पों पर विचार किया?

निर्णय का आधार क्या था?

प्रयोग से क्या सीखा?

असफलता के बाद क्या बदला?

अंतिम समाधान कितना उपयोगी और जिम्मेदार है?

यहीं पोर्टफोलियो, परियोजना, प्रदर्शन, प्रस्तुति, सहपाठी प्रतिक्रिया और आत्म चिंतन जैसे माध्यम महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

अच्छा मूल्यांकन केवल यह नहीं बताता कि विद्यार्थी को क्या आता है; वह यह भी दिखाता है कि विद्यार्थी जो जानता है, उससे क्या कर सकता है।

मूल्यांकन तब केवल परिणाम मापने की प्रक्रिया नहीं रहता; वह अगले सीखने की दिशा दिखाने वाला दर्पण बन जाता है।

9. हर बच्चा एक संभावित सृजनकर्ता :

सृजनशीलता केवल विज्ञान का नमूना बनाने वाले विद्यार्थी में नहीं होती। कोई कविता में नया संसार रचता है, कोई कहानी को नया अंत देता है, कोई गणितीय पहेली बनाता है, कोई पौधों के लिए पानी बचाने की व्यवस्था सोचता है, कोई मशीन की कार्यप्रणाली समझना चाहता है और कोई अपने समुदाय की समस्या का समाधान खोजता है।

सृजनशीलता के अनेक चेहरे हैं।

इसलिए विद्यालय को केवल उच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की प्रतिभा पहचानने से आगे बढ़ना होगा।

किसी बच्चे की जिज्ञासा, कल्पना, प्रश्न पूछने की शैली, समस्या देखने का दृष्टिकोण और असामान्य विचार, ये भी उसकी क्षमता के महत्वपूर्ण संकेत हैं।

शिक्षा का लक्ष्य हर बच्चे को एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट क्षमता को अर्थपूर्ण दिशा देना होना चाहिए।

10. भविष्य तैयार नहीं मिलता; उसे रचा जाता है

दुनिया तेजी से बदल रही है। तकनीक बदल रही है, काम की प्रकृति बदल रही है, सामाजिक चुनौतियाँ बदल रही हैं और पर्यावरणीय संकट नए प्रश्न खड़े कर रहे हैं।

ऐसे समय में विद्यालय यदि केवल पुराने प्रश्नों के पुराने उत्तर सिखाएगा, तो वह बच्चों को उस दुनिया के लिए तैयार करेगा जो शायद अस्तित्व में ही नहीं होगी। हमें ऐसे विद्यार्थी चाहिए जो

नए प्रश्न पूछें।

अलग दृष्टिकोण खोजें।

प्रयोग करने का साहस रखें।

असफलता से सीखें।

तकनीक का जिम्मेदार उपयोग करें।

और अपने ज्ञान को समाज के लिए उपयोगी समाधान में बदलें।

यही सृजनशील शिक्षा की पहचान है।

11. अब शिक्षा को अगला कदम उठाना होगा :

शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य केवल ज्ञान का हस्तांतरण नहीं, बल्कि ज्ञान को सृजन में बदलने की क्षमता जगाना है।

जब कक्षा में कोई विद्यार्थी कहता है

सर, इसका एक और तरीका हो सकता है…

तो वह केवल एक उत्तर नहीं दे रहा होता। वह संकेत दे रहा होता है कि उसकी सोच पाठ्यपुस्तक की सीमा से आगे बढ़ रही है।

और जब विद्यालय का हर बच्चा यह विश्वास लेकर बाहर निकले कि मैं केवल समस्या को समझने वाला नहीं, समाधान का सृजनकर्ता भी बन सकता हूँ, तभी शिक्षा वास्तव में भविष्य का निर्माण शुरू करेगी।

क्योंकि भविष्य किसी किताब के अंतिम अध्याय में लिखा हुआ नहीं है; वह उन विद्यार्थियों के विचारों में आकार लेता है, जिन्हें आज हम प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और कुछ नया रचने का साहस देते हैं।

12. संदर्भ :

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा : विद्यालयी शिक्षा, 2023, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार।

विद्यार्थियों के लिए एआई दक्षता रूपरेखा, 2024, यूनेस्को ।

विद्यालयी शिक्षा में अनुभवात्मक, कौशल आधारित एवं नवाचारी अधिगम संबंधी पहलें, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ।

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