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धार्मिक : सतनाम : जीवन की अमूल्य सम्पदा : आचार्य ज्ञान सागर

Abhyuday Bharat News / Thu, Jul 16, 2026 / Post views : 252

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सतनाम :: जीवन की अमूल्य संपदा

यह सन्देश : अमर टापू की अमर गाथा नामक स्मारिका से लिया गया है

लेखक : आचार्य ज्ञान सागर

संकलन : अनिल बघेल

भारत की मिट्टी सदा से ही संतो के चरणों के स्पर्श से सुगंधित रही है। हर युग में, हर काल में, संतो व महापुरूशों की छत्र-छाया में रहने का सौभाग्य हमें मिला है। भारत को कभी विश्व-गुरू का दर्जा प्राप्त था, इसलिए नहीं कि इस देश ने कभी विश्व पर राज किया था, बल्कि इसलिए, क्योंकि इस देश की पावन धरा पर ऐसी दिव्य आत्माएं अवतरित हुई, जिन्होंने पूरी मानव जाति को नई दिशा दी, जिनकी प्रेरणा मात्र से ही मानव-चेतना ने आध्यात्मिक समृद्धि की उंचाईयां हुई।

भारत की इस आध्यात्मिक बगीया में अनेक फूल खिले, इनमें से ही एक फूल हमारे छत्तीसगढ़ की माटी में भी खिला। इस फूल की खिलावट ऐसी थी की इसकी सुगंध आज भी लाखों लोगों के जीवन को महका रही है, पुलकित कर रही है। ये फूल, कोई और नहीं, बल्कि हमारे प्यारे बाबा, परमसंत, गुरू घासीदास जी है।

..सतनाम, बाबा का पूरा जीवन ही मानव मात्र के उत्थान के लिए समर्पित था। उनकी देशना का पूरा सार एक ही शब्द में समाहित था और वह है "सतनाम". वस्तुतः कोई शब्द नही है, कोई नाम नहीं है, कण-कण के भीतर समाया हुआ "सत्य" है। इस "एक सत्य" को ही सभी धर्मों ने अलग-अलग नाम से पुकारा जैसे जल.... . को कोई पानी कहता है, कोई नीर कहता है, कोई वाटर कहता है। पर अलग-अलग नाम दे देने से जल का स्वाद या गुण अलग-अलग नहीं हो जाता, जल को हम कोई नाम दे दें, पर एक बात तो तय है कि "जल ही जीवन है"..... ठीक उसी तरह उस "एक सत्य" को चाहे हम भगवान कहें, या खुदा कहें या गॉड कहें, पर एक बात तो तय है कि "सत्य ही सृश्टी का जीवन है" इस सत्य को ही बाबा गुरु घासीदास ने "सतनाम" कह के पुकारा।

"सतनाम की महिमा" इतनी है कि कई संतो ने इसे कात्यात्मक ढंग से "परमात्मा की आत्मा" तक कह डाला, जैसे सैकडों प्रकार की विभिन्न मिठाईयां बनती है, उपर-उपर से उनकी बनावट, सजावट व स्वाद में काफी अंतर होता है पर मूल रूप से उन सभी मिठाईयों की आत्मा (मिठास) वह "शक्कर" होती है जो सभी मिठाईयों में मौजूद होती है.... ठीक वैसे ही पूरी सृश्टि में करोडों-अरबों विभिन्नताऐं दिखाई पडती है, पर सभी के भीतर एक तत्व अभिन्न रूप से मौजूद है और वह है "सतनाम" जिस प्रकार बिना शक्कर के मिठाई का बनना संभव नहीं, ठीक उसी तरह "सतनाम" के बिना

सृश्टि की जीवंतता संभव नहीं। "अनेकता में एकता" पूरी सृश्टि की आध्यात्मिक विशेशता है, क्योंकि अनेक-अनेक ढंग से वही एक "सतनाम" प्रगट हो रहा है।

बाबा का मूल संदेश यही था कि हर व्यक्ति अपने भीतर विद्यमान सतनाम को जान ले, सतनाम को मानने से ज्यादा जरूरी है, उसे अपने अनुभव से जानना, जैसे 'शक्कर-शक्कर' कहने से हमारा मुंह मीठा नहीं हो जाता अर्थात् हम उसका स्वाद नहीं जान पाते ठीक वैसे ही मात्र सतनाम-सतनाम कहने से हम उसकी दिव्यता का पूरा-पूरा अनुभव नहीं कर सकते क्योंकि "सतनाम", 'नमस्कार', या गुड मार्निंग जैसा मात्र अभिवादन का शब्द नहीं है अपितु धर्म का वह बीज है जिसे अपने हृदय भूमि में अंकुरित किये बिना परमात्मा का फूल नहीं खिलाया जा सकता।

अतः आप सभी से विनम्र प्रार्थना है कि बाबा के "सतनाम" के संदेश को ठीक-ठीक ढंग से समझें। किसी कामिल मुर्शिद के सानिध्य में जाकर, अपने भीतर गुंजते हुए उस "सतनाम" को जानें तभी हमारे जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आयेगा और मन के सारे मैल साफ होंगे। "सफेद वस्त्र" की तरह हमारा मन भी उजला हो जायेगा और जैतखाम की तरह इंसानियत भी गर्व से सिर उठा के खड़ा हो सकेगा और इस तरह से बाबा गुरु घासीदास जी का वह सपना भी पूरा हो जायेगा, जिसे पूरा करने के लिए वे जीवन भर हमें पुकारते रहे और गाते रहे.....।

"सतनाम ले लौ, ले लौ हो सतनाम ले लौ.

आचार्य - ज्ञान सागर

किसी भी प्रकार क़े लेख, कविता, गीत, आर्टिकल, रचना, शिक्षा, धार्मिक, अध्यात्म, या सन्देश देना चाहते है तो, हमारे न्यूज़ पोर्टल क़े दिए नंबर पर सम्पर्क कर सकते है

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