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उत्तर प्रदेश :-वाराणसी न्यूज़ : जनजातीय भाषाओं के संरक्षण व बहुभाषी शिक्षा पर जोर, राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल समापन

Abhyuday Bharat News / Sat, Apr 18, 2026 / Post views : 706

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वाराणसी, 18 अप्रैल,2026/

वसंत महिला महाविद्यालय, राजघाट, वाराणसी में आयोजित आईसीएसएसआर प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का 18 अप्रैल 2026,शनिवार को सफल समापन हुआ।

“संताली, मुंडारी एवं हो भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में सामुदायिक, डिजिटल एवं सांस्कृतिक नवाचार” विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर के शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विशेषज्ञों ने भाग लेकर महत्वपूर्ण विचार-विमर्श किया।

महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. अलका सिंह ने समापन अवसर पर सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

संगोष्ठी के संयोजक प्रो. (डॉ.) जय सिंह ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इसके उद्देश्यों और निष्कर्षों को साझा किया, जबकि सह-संयोजक डॉ. प्रवीण कुमार ने आयोजन के सफल संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

दूसरे दिन के सत्रों में सांस्कृतिक स्थिरता, स्वदेशी ज्ञान प्रणाली, नीतिगत ढांचे तथा डिजिटल हस्तक्षेप जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता डॉ. सुभाष चंद्र महतो ने जनजातीय ज्ञान परंपराओं की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे के पूरक हैं। वहीं डॉ. पंकज दास ने भाषाओं के संरक्षण हेतु सशक्त नीति, कानूनी समर्थन एवं डिजिटल संसाधनों के विकास की आवश्यकता पर बल दिया।

पैनल चर्चा में प्रो. रमाकांत सिंह, प्रो. रविरंजन कुमार, डॉ. विमल कुमार लहरी, डॉ. पंकज दास, डॉ. सुभाष चंद्र महतो, डॉ. श्रीपति टुडु, डॉ. सुनील मुर्मू, डॉ. बृजभान मरावी आदि ने अपने विचार साझा किये l सत्र का संचालन प्रो. संजीव कुमार ने किया l

आयोजित पैनल चर्चा में विशेषज्ञों ने समुदाय, शिक्षा संस्थानों और नीति-निर्माताओं के बीच समन्वित प्रयासों की जरूरत बताई, ताकि जनजातीय भाषाओं को शिक्षा, रोजगार और डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जा सके। इस दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों द्वारा 160 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए, जिससे संगोष्ठी का अकादमिक स्तर और अधिक समृद्ध हुआ।

समापन सत्र में प्रो. ओंकार प्रसाद, प्रो. सुनील कुमार सिंह एवं प्रो. बानी चटर्जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है तथा जनजातीय भाषाओं के संरक्षण के लिए ठोस और सतत प्रयास जरूरी हैं।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीलिमा सचवानी ने किया तथा अंत में प्रो. आशा पांडेय ने धन्यवाद ज्ञापित किया। सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं हाई-टी के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि यह संगोष्ठी केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो भविष्य में समावेशी और बहुभाषी शिक्षा को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगी।

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