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: इंसानों के शरीर में जमा हो रही प्लास्टिक! लिवर और किडनी से भी बड़े हैं टुकड़े, नई स्टडी में हुआ खुलासा

Admin / Mon, Sep 23, 2024 / Post views : 181

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ABN EXPRESS NEWS 24x7

एक नई रिसर्च पेपर में खुलासा हुआ है कि मानव शरीर के हर भाग में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई है. ऐसे माइक्रोप्लास्टिक को लेकर कई बड़ी बाते सामने आई हैं. वैज्ञानिकों की मानें तो माइक्रोप्लास्टिक की समस्या पहले कभी इतनी गंभीर नहीं रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए सामूहिक विश्व स्तर करने की कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है.

माइक्रोप्लास्टिक पर एक रिसर्च से बड़ा खुलासा हुआ है. इसमें माइक्रोप्लास्टिक पर करीब 7 हजार स्टडीज पर एक विश्लेषण किया गया है. साइंस मैगजीन के मुताबिक एक रिसर्च पेपर से पता चला है कि 20 सालों से धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक जंगली जानवरों में और लोगों के शरीर में कई कण की मौजूदगी पाई गई है. माइक्रोप्लास्टिक बड़े पैमाने पर फैले हुए हैं. इस स्टडी से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक खान-पान के जरिए शरीर के अंदर आसानी से आ रहे हैं. इन रिसर्च पेपर में बताया गया कि मानव शरीर के हर भाग में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई है. ऐसे माइक्रोप्लास्टिक को लेकर कई दुष्प्रभावों को लेकर कई सबूत सामने आए हैं. वैज्ञानिक सबूतों की मानें तो माइक्रोप्लास्टिक की समस्या पहले कभी इतनी गंभीर नहीं रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए सामूहिक विश्व स्तर करने की कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है.

छोटे टुकड़े बन जाते हैं बड़ी समस्या

प्लास्टिक के बहुत छोटे टुकड़ों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है, इनकी लंबाई पांच मिलीमीटर या उससे कम होती है. कुछ उत्पादों में माइक्रोप्लास्टिक जानबूझकर मिलाए जाते हैं. जैसे कि चेहरे पर लगाए जाने वाले साबुन में माइक्रोबीड का इस्तेमाल होता है. वहीं बाकी के उत्पादों में प्लास्टिक के बड़े टुकड़े टूटने से माइक्रोप्लास्टिक अनजाने में पैदा हो जाता है. आसानी से समझने के लिए ये जानिए कि पॉलिस्टर की जैकेट धोने से जो उससे रेशे निकलते हैं, वो भी एक तरह से माइक्रोप्लास्टिक होते हैं.

इन सबसे निकलते हैं माइक्रोप्लास्टिक

कई स्टडीज और रिसर्च से पता चलता है कि माइक्रोप्लास्टिक के कुछ सोर्स की पहचान की गई है. कॉस्मेटिक क्लेंजर, सिंथेटिक कपड़े, गाड़ियों के टायर, प्लास्टिक की परत वाली खाद, मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली रस्सी और जाल, मिट्टी की ऊपरी परत को ढकने के लिए प्लास्टिक की पतली परत के इस्तेमाल से माइक्रोप्लास्टिक पैदा होते है. प्लास्टिक के बड़े कण किस दर से टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में तब्दील होते हैं, विज्ञान अभी इसका आकलन नहीं कर पाया है. वैज्ञानिक ये भी पता लगाने की कोशिशों में जुटे हैं कि माइक्रोप्लास्टिक कितनी तेजी से टूटकर नैनोप्लास्टिक का रूप ले लेते हैं, जिनका आकार एक माइक्रॉन से कम होता है और जिन्हें हम आम आंखों से भी नहीं देख सकते हैं.

माइक्रोप्लास्टिक बन रहा मुसीबत

हवा, मिट्टी और पानी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक का स्तर आंकना काफी मुश्किल है, लेकिन रिसर्च में इसकी कोशिश की जा रही है. साल 2020 में सामने आई एक रिसर्च से अनुमान लगाया गया था कि समुद्र में हर साल आठ लाख से 30 लाख टन माइक्रोप्लास्टिक पहुंचता है. वहीं एक हालिया रिपोर्ट में पर्यावरण में समुद्र के मुकाबले तीन से दस गुना ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक पहुंचने के संकेत दिए गए हैं. अगर ये अनुमान सही है कि तो इसका मतलब है कि हर साल कुल एक करोड़ से चार करोड़ टन माइक्रोप्लास्टिक समुद्र और पर्यावरण में पहुंचते हैं.

कीड़ो से लेकर जंगली जानवरों तक में पाया गया माइक्रोप्लास्टिक

इसमें चिंता का विषय ये है कि 2040 तक पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक एकत्र होने की दर दोगुनी होने की आशंका है. अगर लोग अभी भी पर्यावरण में माइक्रोप्लास्टिक का प्रवाह रोक भी देता है, तो भी प्लास्टिक के बड़े टुकड़ों का टूटना जारी रहेगा. मछलियों, पक्षियों और कीड़ों सहित 1,300 से अधिक जीव-जंतुओं में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई है. कुछ जानवर माइक्रोप्लास्टिक को खाना समझकर उन्हें निगल लेते हैं, जिससे उनकी आंतों के सड़ने का खतरा होता है. जानवरों को तब भी नुकसान पहुंचता है, जब उनके शरीर में मौजूद प्लास्टिक को टुकड़े रसायनों को डिस्चार्ज करते हैं.

इंसानों के शरीर में कैसे घुसते जाता है माइक्रोप्लास्टिक

जब हम पानी पीते हैं, खाना खाते हैं और हवा में सांस लेते हैं, उन सबमें माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की पुष्टि हुई है. इतना ही नहीं बल्कि माइक्रोप्लास्टिक सी फूड से लेकर नमक, शहद, चीनी, बीयर और चाय तक में मिले हैं. कभी-कभी पर्यावरण में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक खाने वाली चीजो में मिल जाते हैं. कई मामलों में तो पैकेजिंग और रख-रखाव के दौरान इनके अंश भी उनमें पहुंच जाते हैं. वैज्ञानिकों ने मनुष्य के फेफड़ों, लिवर, किडनी, खून और प्रजनन अंगों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की है. ये टुकड़े धीरे-धीरे हमारे दिमाग और दिल में भी पाए गए हैं. हालांकि, कुछ माइक्रोप्लास्टिक यूरीन के रास्ते हमारे शरीर से बाहर निकल जाते हैं, लेकिन कई लंबे समय तक उसमें मौजूद भी रहते हैं. इनसे इंसानों की आंतों के सड़ने का भी खतरा होता है

माइक्रोप्लास्टिक का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है?

माइक्रोप्लास्टिक अलग-अलग तरह के होते हैं. इनमें अलग-अलग तरह के रसायन भी होते हैं. ये तरल पदार्थ या सूरज की रोशनी के संपर्क में आने पर अलग तरह से रिएक्ट करते हैं. इसके अलावा, जीवों की प्रजातियां भी अलग-अलग होती हैं. इससे वैज्ञानिकों के लिए माइक्रोप्लास्टिक के दुष्प्रभावों का आकलन करना थोड़ा कठिन हो जाता है. हालांकि, मानव स्वास्थ्य पर इसके असर का पता लगाने में जरूर थोड़ी सफलता मिली है. आने वाले सालों में मानव शरीर पर इनका दुष्प्रभाव ऐसे स्पष्ट हो सकता है. जब माइक्रोप्लास्टिक असर करेगा तो आपके शरीर में सूजन हो सकती है. ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस यानी फ्री रैडिकल और एंटीऑक्सीडेंट के बीच असंतुलन भी हो सकता है. इससे धीर-धीरे इम्यूनिटी भी कमजोर होती है.

माइक्रोप्लास्टिक को लेकर बढ़ रही चिंताएं

माइक्रोप्लास्टिक को लेकर लोगों की चिंताएं बढ़ रही हैं. पर्यावरण में जमा माइक्रोप्लास्टिक को हटाना लगभग नामुमकिन है और लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने का अंदेशा है, इसलिए चिंताएं और बढ़ रही हैं. माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण मानव गतिविधियों और फैसलों का नतीजा है. कुछ देशों ने माइक्रोप्लास्टिक के डिस्चार्ज पर लगाम लगाने के लिए कानून लागू किए हैं, लेकिन ये समस्या से निपटने के लिए काफी नहीं है. इसको लेकर नवंबर में विश्व स्तर में इसे लेकर पांचवें दौर की बातचीत होगी.

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