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: शहर में चल रहा बेखौफ़ अपंजीकृत पेट शॉप, एक भी पेट शॉप पंजीकृत नहीं, कार्यवाही क्यों नहीं....?

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  • बरसों से पालतू पशु दुकान, डॉग ब्रीडिंग सेंटर, पालतू पशु प्रजनन केंद्र चल रहे हैं अपंजीकृत 

  • एक भी पंजीकृत नहीं, कार्यवाही क्योंनहीं....

राजीव प्लाजा की दुकानों का किराया अघोषित रूप से 40 से ₹50000 तक भी बताया जाता है। कुत्ता, बिल्ली , मछली, तोता, खरगोश, चूहा, कछुआ बेचने वाले दुकानदार जब इतनी बड़ी धनराशि को किराए के रूप में अदा करते हैं तो एक निशुल्क पंजीयन से पीछे क्यों हटते हैं। पशु चिकित्सा विभाग पिछले 3 साल से पशु, पक्षी प्रजनन/विक्रेता से पंजीयन करने के लिए प्रयास रत हैं। पर सफलता नहीं मिलती जानकार बताते हैं कि पशु पक्षी विक्रेता दुकानों पर विभाग के कई लोग नियमित रूप से आना-जाना करते हैं। कुछ तो सस्ते में कुत्तों के बच्चे को लाकर महंगे दामों पर बिकवाने का काम भी करते हैं। पर इन्हें पंजीयन के लिए प्रेरित नहीं करते सीधा अर्थ है वेटनरी विभाग के ऐसे कर्मचारी और दुकानदारों के बीच आपसी सद्भावना जिसमें आर्थिकपक्ष भी शामिल है के तहत काम चल रहा है। इन दुकानदारों के पास गोमास्था ही है और उसे भी ये दुकानदार अपने डिस्प्ले पर नहीं लगते जबकि यह नियम में शामिल है। गोमास्था को सूचना पटल पर न लगाने के पीछे कई कारण हैं। व्यवसाय का शीर्षक, कर्मचारियों की संख्या, साप्ताहिक अवकाश को ना दिखाना पड़े बड़ा कारण है।

https://youtu.be/6UODV42zvnc?si=zTAP572l-vL0KXlS

राजीव प्लाजा के एक बड़े दुकानदार ने तो चर्चा में दैनिक भास्कर के मालिक के मालिक और उसके भी मालिक से अपना घरोब कहा मैं भी प्रेस वाला हूं बैलट पेपर छपता था। शहर में कुत्ते से महंगी बिल्ली बिकती है नवभारत प्रेस के ठीक सामने स्थित बिल्ली विक्रेता दुकानदार ने जब आने का करण समझा तो बिल्ली के बच्चे रिश्तेदारों को उपहार में देने की बात कही जिस व्यवसाय से व्यवसाय धारक अपने घर द्वार चलते हैं। अपने महत्वाकांक्षा को पूरा करते हैं इसके बारे में सिरे से मुकर जाना व्यावसायिक ईमानदारी तो नहीं कहीं जा सकती और बिलासपुर में समस्त पशु पक्षी विक्रेता दुकानदारों का व्हाट्सएप ग्रुप है। कीमत के संबंध में मौखिक समझौता है कोई दुकानदार ₹1 काम में कुत्ता बिल्ली नहीं बेचता पर यही ईमानदारी पंजीयन के संदर्भ में नदारत हो जाती है। उन्हें पता है एक बार पंजीयन करने के बाद कौन ब्रिडर है पता चलेगा एक मादा के स्वास्थ्य को खतरे में डालकर लाखों रुपए कमाना अमानवीय पशु क्रूरता अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय अपराध बन जाएगा इसलिए पंजीयन से भागते हैं।

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