अधिगम प्रतिफलों के विश्लेषण से सीखने की दूरी पहचानने और कक्षा-कक्ष को बेहतर बनाने की चुनौती
✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
( त्वचाविज्ञान आधारित बहु-बुद्धिमत्ता परीक्षण विशेषज्ञ एवं मानसिकमाप परामर्शदाता )
हर परीक्षा के बाद हमारे पास अंक होते हैं; लेकिन क्या हमारे पास यह जानने का पर्याप्त उत्तर भी होता है कि उन अंकों के पीछे विद्यार्थी की वास्तविक समझ कितनी है?
विद्यालयी शिक्षा में परीक्षा परिणाम लंबे समय से विद्यार्थी की उपलब्धि का प्रमुख पैमाना रहे हैं। अंक आवश्यक हैं, लेकिन वे शिक्षा की पूरी कहानी नहीं कहते। वे यह बता सकते हैं कि विद्यार्थी ने परीक्षा में कैसा प्रदर्शन किया; पर यह हमेशा नहीं बताते कि उसने क्या समझा, कितना सीखा और सीखी हुई बात को नई परिस्थितियों में कितना उपयोग कर सकता है।
यही वह बिंदु है जहाँ अधिगम प्रतिफल का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।
अधिगम प्रतिफल का सरल अर्थ है किसी पाठ, विषय या कक्षा स्तर के अध्ययन के बाद विद्यार्थी क्या जानता है, क्या समझता है और क्या कर सकता है। इसलिए अधिगम प्रतिफलों का विश्लेषण केवल परीक्षा परिणामों की समीक्षा नहीं, बल्कि शिक्षण को अधिक प्रभावी और सीखने को अधिक सार्थक बनाने का माध्यम है।
अंक उपलब्धि का संकेत हो सकते हैं, किंतु अधिगम का संपूर्ण प्रमाण नहीं।
1. अंक कितने नहीं, सीखना कितना? :
समान अंक प्राप्त करने वाले दो विद्यार्थियों की समझ, तर्कशक्ति, समस्या समाधान क्षमता और ज्ञान के प्रयोग की दक्षता अलग अलग हो सकती है। इसलिए परीक्षा परिणाम को शिक्षा की संपूर्ण गुणवत्ता का पर्याय मान लेना उचित नहीं होगा।
अधिगम प्रतिफलों का विश्लेषण केवल यह पूछने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि कितने विद्यार्थी सफल हुए?
इसके साथ यह भी पूछा जाना चाहिए किस विषय, अवधारणा या कौशल में कितने विद्यार्थी अपेक्षित स्तर तक पहुँच पाए?
और सबसे महत्वपूर्ण जो विद्यार्थी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाए, उसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं?
यहीं सामान्य परीक्षा विश्लेषण और वास्तविक अधिगम विश्लेषण के बीच अंतर स्पष्ट होता है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी में समझ, विवेक, तर्क, सृजनशीलता और ज्ञान के सार्थक प्रयोग की क्षमता विकसित करना है।
2. सीखने की दूरी कहाँ पैदा होती है?
किसी विद्यार्थी का अपेक्षित स्तर तक न पहुँच पाना केवल उसकी व्यक्तिगत कमी नहीं माना जा सकता। सीखना अनेक परस्पर जुड़े कारकों से प्रभावित होता है पूर्वज्ञान, भाषा, सीखने की गति, उपस्थिति, पारिवारिक परिवेश और सीखने के प्रति आत्मविश्वास।
लेकिन जिम्मेदारी केवल विद्यार्थी तक सीमित नहीं है।
शिक्षक की शिक्षण पद्धति, विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं को समझने की क्षमता, मूल्यांकन की दृष्टि, विद्यालय का वातावरण, शैक्षिक नेतृत्व, उपलब्ध संसाधन और शिक्षक सहयोग सभी अधिगम को प्रभावित करते हैं।
इसी प्रकार पाठ्यचर्या, मूल्यांकन पद्धति, शिक्षक प्रशिक्षण और उपलब्ध आंकड़ों के सार्थक उपयोग की संस्कृति भी सीखने की गुणवत्ता को दिशा देती है।
इसलिए अधिगम अंतर अर्थात विद्यार्थी के अपेक्षित और वास्तविक सीखने के स्तर के बीच की दूरी को केवल “विद्यार्थी की कमजोरी” मान लेना समस्या को बहुत सीमित दृष्टि से देखना होगा।
विद्यार्थी कमजोर नहीं होता; कई बार हमारी शिक्षण रणनीति उसकी आवश्यकता तक नहीं पहुँच पाती।
3. जहाँ परिणाम रुकते हैं, वहीं विश्लेषण शुरू होता है :
यदि किसी विद्यार्थी की उपलब्धि अपेक्षित स्तर से कम है, तो उसे केवल ‘कमजोर’ कह देना समस्या का समाधान नहीं है। यह जानना आवश्यक है कि कठिनाई कहाँ है अवधारणा की समझ में, पूर्वज्ञान में, भाषा में, अभ्यास में, ज्ञान के प्रयोग में, समस्या समाधान में अथवा सीखने के पर्याप्त अवसरों के अभाव में।
यहीं निदानात्मक मूल्यांकन महत्वपूर्ण हो जाता है।
मूल्यांकन का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं होना चाहिए कि विद्यार्थी ने कितना सही या गलत किया। उसे यह भी संकेत देना चाहिए कि कठिनाई कहाँ और क्यों उत्पन्न हुई तथा आगे किस प्रकार का शिक्षण सहयोग आवश्यक है।
अर्थात मूल्यांकन को परिणाम दर्ज करने की प्रक्रिया से आगे बढ़ाकर अगले शिक्षण निर्णय का आधार बनाना होगा।
4. आंकड़ों से कार्रवाई तक :
आज विद्यालयों के पास विद्यार्थियों के सीखने से संबंधित पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आंकड़े उपलब्ध हैं। किंतु आंकड़ों की उपलब्धता मात्र से शैक्षिक सुधार सुनिश्चित नहीं होता।
आंकड़े तब तक अधूरे हैं, जब तक वे कक्षा में कोई सार्थक परिवर्तन न ला दें।
अधिगम प्रतिफलों के विश्लेषण का उद्देश्य केवल आंकड़े एकत्र करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि किस विद्यार्थी को किस प्रकार के शैक्षिक सहयोग की आवश्यकता है।
यदि बड़ी संख्या में विद्यार्थी किसी अवधारणा को समझ नहीं पाए हैं, तो प्रश्न होना चाहिए अब हमारे शिक्षण में क्या बदलना होगा?
यदि किसी समूह को विशेष सहायता चाहिए, तो लक्षित सुधारात्मक शिक्षण होना चाहिए। यदि कोई पद्धति अपेक्षित परिणाम नहीं दे रही, तो उसमें परिवर्तन आवश्यक है। और यदि किसी हस्तक्षेप से सुधार दिखाई देता है, तो उसके प्रभावी पक्षों को व्यापक स्तर पर अपनाया जाना चाहिए।
इस प्रकार मूल्यांकन को एक सतत चक्र बनाना होगा :
मूल्यांकन → विश्लेषण → अधिगम-अंतर की पहचान → कारणों की समझ → लक्षित हस्तक्षेप → पुनर्मूल्यांकन → सुधार।
यहीं आंकड़े कागज से निकलकर कक्षा के जीवंत अनुभव में बदलते हैं।
5. कमजोर विद्यार्थी नहीं अलग सीखने की आवश्यकता :
अधिगम अंतर की पहचान के बाद सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसी अतिरिक्त कक्षा चलाना पर्याप्त नहीं होगा। सुधारात्मक शिक्षण को उस विशिष्ट कठिनाई पर केंद्रित करना होगा, जो किसी विद्यार्थी या समूह के सीखने में बाधा बन रही है।
गतिविधि आधारित शिक्षण, स्थानीय जीवन से जुड़े उदाहरण, प्रयोग, छोटे समूहों में कार्य, सहपाठी अधिगम, नियमित अभ्यास तथा व्यक्तिगत शैक्षिक सहयोग इसके प्रभावी माध्यम हो सकते हैं।
भाषा की संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी विद्यार्थी को “कमजोर” कह देना उसके बारे में एक स्थायी धारणा बना सकता है।
हर विद्यार्थी सीख सकता है; अंतर केवल इतना है कि उसे सीखने के लिए किस प्रकार के अवसर, समय और सहयोग की आवश्यकता है।
यही दृष्टिकोण शिक्षा को अधिक मानवीय और समावेशी बनाता है।
6. रटने से समझने तक :
यदि मूल्यांकन केवल तथ्यों को याद रखने और दोहराने तक सीमित रहेगा, तो वह विद्यार्थी के वास्तविक अधिगम की पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं कर पाएगा।
आवश्यकता ऐसे मूल्यांकन की है, जो यह भी देखे कि विद्यार्थी :
अवधारणा को कितना समझता है;
सीखी हुई बात को कहाँ और कैसे प्रयोग करता है;
समस्या का समाधान किस प्रकार करता है;
अपने विचार के पक्ष में तर्क कैसे प्रस्तुत करता है;
विभिन्न परिस्थितियों के बीच संबंध कैसे स्थापित करता है;
और नई परिस्थिति में अपने ज्ञान का उपयोग कैसे करता है।
इसलिए मूल्यांकन की दिशा “क्या याद है?” से “क्या समझा, क्या कर सकता है और कहाँ प्रयोग कर सकता है?” की ओर बढ़नी चाहिए।
यह केवल प्रश्न पत्र बदलने का विषय नहीं है; यह शिक्षण की संस्कृति बदलने का प्रश्न है।
7. शिक्षक: परिणाम बताने वाला नहीं, अधिगम बदलने वाला
अधिगम प्रतिफल आधारित शिक्षा में शिक्षक केवल विषय-वस्तु प्रस्तुत करने वाला नहीं, बल्कि मार्गदर्शक, निदानकर्ता, विश्लेषक और सुधारात्मक शिक्षण का योजनाकार है।
अच्छा शिक्षक केवल यह नहीं देखता कि विद्यार्थी कहाँ खड़ा है; वह यह भी खोजता है कि उसे अगली सीखने की सीढ़ी तक पहुँचाने के लिए क्या आवश्यक है।
इसलिए शिक्षक प्रशिक्षण को विषय वस्तु और सामान्य शिक्षण पद्धतियों से आगे ले जाना होगा। शिक्षक को आंकड़ों को समझने, अधिगम अंतर की पहचान करने, उपयुक्त हस्तक्षेप चुनने और उसके परिणामों का पुनर्मूल्यांकन करने में सक्षम बनाना होगा।
शिक्षक को विद्यार्थियों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण में परिवर्तन करने के लिए पर्याप्त शैक्षिक स्वतंत्रता, संसाधन और सहयोग भी मिलना चाहिए।
8. तकनीक: साधन, समाधान नहीं
डिजिटल मंच, ऑनलाइन मूल्यांकन, अधिगम विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण सीखने की स्थिति समझने और व्यक्तिगत सहायता उपलब्ध कराने में उपयोगी हो सकते हैं।
लेकिन तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं है।
तकनीक आंकड़ों को समझने में सहायता कर सकती है; विद्यार्थी को समझने का अंतिम दायित्व मानवीय शिक्षक के पास ही रहता है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं कि विद्यालय में कितनी तकनीक पहुँची है। प्रश्न यह है क्या तकनीक ने विद्यार्थी को बेहतर सीखने में सहायता की?
तकनीक का लक्ष्य अधिक डिजिटल शिक्षा नहीं, बल्कि अधिक प्रभावी, समावेशी और मानवीय शिक्षा होना चाहिए।
9. आंकड़ों से निर्णय तक :
अधिगम सुधार केवल शिक्षक की जिम्मेदारी नहीं है। विद्यालय नेतृत्व की भूमिका भी निर्णायक है।
प्राचार्य और प्रधान पाठक ऐसी शैक्षिक संस्कृति विकसित कर सकते हैं, जिसमें परीक्षा परिणाम केवल अभिलेख न रहें, बल्कि शिक्षक चर्चा, कक्षा अवलोकन, शिक्षण योजना और विद्यार्थी सहायता का आधार बनें।
यदि आंकड़े किसी विषय या कौशल में लगातार कम उपलब्धि की ओर संकेत करते हैं, तो विद्यालय को पूछना चाहिए क्या बदलना है? कौन बदलेगा? कब तक बदलेगा? और सुधार को कैसे जाना जाएगा?
नियमित शैक्षिक समीक्षा का उद्देश्य दोष ढूँढ़ना नहीं, बल्कि समाधान खोजना होना चाहिए।
10. नीति से कक्षा तक: असली परीक्षा यहीं है
किसी भी शैक्षिक रणनीति की सफलता उसके दस्तावेज या निर्देश में नहीं, बल्कि कक्षा में दिखाई देने वाले परिवर्तन में होती है।
एक प्रभावी रणनीति की यात्रा स्पष्ट होनी चाहिए :
नीति → विद्यालय की कार्ययोजना → शिक्षक का लक्षित हस्तक्षेप → विद्यार्थी का अधिगम → पुनर्मूल्यांकन → सुधारात्मक निर्णय।
उत्कृष्ट नीति यदि कक्षा तक नहीं पहुँचती, तो उसका प्रभाव सीमित रहेगा। उत्कृष्ट शिक्षण यदि आंकड़ों से जुड़ा नहीं है, तो सुधार की दिशा अस्पष्ट रह सकती है। और प्रभावी हस्तक्षेप यदि पुनर्मूल्यांकन से नहीं जुड़ता, तो उसकी वास्तविक उपयोगिता सामने नहीं आएगी।
इसलिए अधिगम सुधार को एक बार की गतिविधि नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखना होगा।
11. परिणाम से आगे: सीखने की संस्कृति
शैक्षिक सुधार की सबसे बड़ी भूल तब होती है, जब केवल परिणाम बढ़ाने को सफलता मान लिया जाता है।
परिणाम बढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है यह जानना कि परिणाम क्यों बढ़े।
क्या विद्यार्थियों ने अवधारणाएँ बेहतर समझीं?
क्या वे ज्ञान का प्रयोग करने लगे?
क्या उनकी समस्या-समाधान क्षमता विकसित हुई?
क्या वे नई परिस्थितियों में सीखी हुई बातों का उपयोग कर पाए?
यदि उत्तर हाँ है, तभी परिणाम में सुधार को वास्तविक शैक्षिक सुधार कहा जा सकता है। अन्यथा बढ़े हुए अंक केवल एक आंकड़ा बनकर रह जाते हैं।
शिक्षा की दृष्टि से लक्ष्य केवल उच्च परिणाम नहीं, उच्च गुणवत्ता वाला अधिगम होना चाहिए।
12. अंतिम कसौटी: क्या अधिगम बदला?
अधिगम प्रतिफलों में सुधार की वास्तविक यात्रा केवल परीक्षा परिणाम बढ़ाने की यात्रा नहीं है। यह प्रत्येक विद्यार्थी को उसके वर्तमान सीखने के स्तर से अपेक्षित स्तर तक पहुँचाने की प्रक्रिया है।
किसी भी शैक्षिक रणनीति का केंद्र केवल औसत परिणाम नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी का वास्तविक अधिगम होना चाहिए।
शिक्षा की अंतिम कसौटी यह नहीं कि विद्यार्थी ने कितना लिखा, बल्कि यह है कि वह कितना समझकर आगे बढ़ा।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहचान केवल इस बात से नहीं होगी कि कितने विद्यार्थी परीक्षा में सफल हुए। उसकी असली पहचान यह होगी कि कितने विद्यार्थी समझ पाए, सीखे, अपने ज्ञान का प्रयोग कर पाए और नई परिस्थितियों में उसका सृजनात्मक उपयोग कर पाए।
इसीलिए अधिगम प्रतिफल विश्लेषण को मूल्यांकन की अंतिम सीढ़ी नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षण की पहली सीढ़ी बनाना होगा।
शिक्षा के पूरे विमर्श को एक प्रश्न में समेटा जा सकता है क्या हम विद्यार्थियों के अंकों को पढ़ रहे हैं, या उन अंकों के पीछे छिपी उनकी सीखने की कहानी को?
यही प्रश्न हमें परिणाम केंद्रित शिक्षा से अधिगम केंद्रित, विद्यार्थी केंद्रित और सतत सुधार की संस्कृति वाली शिक्षा की ओर ले जा सकता है।
हर आंकड़ा सार्थक निर्णय बने, हर निर्णय प्रभावी हस्तक्षेप बने और हर हस्तक्षेप विद्यार्थी के बेहतर अधिगम में दिखाई दे, तभी अंक उपलब्धि से आगे बढ़कर शिक्षा की वास्तविक कहानी कहेंगे।
13. संदर्भ :
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020. नई दिल्ली: भारत सरकार।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा विद्यालयी शिक्षा, 2023. नई दिल्ली: एनसीईआरटी।
वैश्विक शिक्षा निगरानी रिपोर्ट 2023: शिक्षा में प्रौद्योगिकी किसकी शर्तों पर? पेरिस: यूनेस्को।
अधिगम प्रतिफल. नई दिल्ली: एनसीईआरटी 2017।