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Admin / Mon, Jul 15, 2024 / Post views : 537

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कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष खड्ग प्रसाद (केपी) शर्मा ओली को नेपाल के नए प्रधानमंत्री के तौर पर नियुक्त किया गया है.

राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ़ से जारी एक बयान में कहा गया है कि राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने रविवार शाम नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 76 (2) के अनुसार, ओली को प्रधानमंत्री नियुक्त किया. ओली ने दो दिन पहले सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के समर्थन से बहुमत का दावा पेश किया था. 2015 में 10 महीने, 2018 में 40 महीने और 2021 में तीन महीने, कुल मिलाकर साढ़े चार साल तक ओली नेपाल के प्रधानमंत्री रहे हैं.

अलग-अलग कार्यकाल में उनके प्रशंसक और आलोचक बनते आए हैं.

केपी ओली का ज़िक्र आते ही उनके प्रशंसकों के सामने जो मुख्य छवि उभरती है, वह है- एक तेज़तर्रार नेता, जिन्होंने कई बार प्रधानमंत्री बनकर देश का नेतृत्व किया, राष्ट्रवाद का समर्थन करते हैं और दो बार किडनी ट्रांसप्लांट होने के बावजूद सक्रिय राजनीतिक जीवन में हैं. नेपाल से जुड़ी ये अहम कहानियां भी पढ़ें

नेपाल में क्यों बढ़ रही है भारत विरोधी भावना? चीन में बढ़ी दिलचस्पी

नेपाल इतना महंगा क्यों है? ढेर सारा भारतीय रुपया भी पड़ता है कम पिछले साल उन्होंने नेपाली अख़बार कांतिपुर में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था- ''मैंने अपने दिमाग़ से 'हार' और 'अपमान' को हटा दिया है.'' इस लेख में ओली लिखते हैं, ''कभी-कभी अगर मुझसे कोई आगे निकल जाता है तो जब तक वो मुझसे आगे निकलने की ख़ुशी मना रहा होता है, उस वक़्त मैं हमले की तैयारी कर रहा होता हूँ. ये एक मानवीय प्रवृत्ति है. जब मैं गिरता हूं तो तुरंत उठ भी जाता हूँ.''

राजनीतिक के मंझे हुए खिलाड़ी हैं ओली

साल 2022 में हुए चुनाव में उनकी पार्टी संसद में बड़ी पार्टी से दूसरे नंबर की पार्टी बन गई लेकिन चुनावी नतीजों के बाद वह सरकार बनाने के खेल में आगे निकल गए.

उस वक़्त प्रचंड को केपी शर्मा ओली की पार्टी का समर्थन मिला था. ओली ने प्रचंड को प्रधानमंत्री और उनके सांसदों को मंत्री बनवाया.

इसके बाद राजनीतिक घटनाक्रम में तेज़ उतार-चढ़ाव देखने को मिले. प्रचंड की पार्टी 'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर)' ने राष्ट्रपति पद के लिए नेपाली कांग्रेस नेता रामचंद्र पौडेल का समर्थन किया था, जिसके बाद यूएमएल-माओवादी गठबंधन टूट गया. आख़िरकार कांग्रेस के समर्थन से अब केपी ओली प्रधानमंत्री बन गए हैं. लेकिन कांग्रेस-यूएमएल का ये गठबंधन कितने समय तक चलेगा, इस पर ख़ुद प्रचंड ने भी संदेह जताया है. विश्वासमत का सामना करने के दौरान प्रचंड ने शुक्रवार को संसद में अपने भाषण में ओली पर कटाक्ष करते हुए कहा, ''कृपया संसद को ख़त्म न करें.'' इस व्यंग्य का मक़सद ओली की तरफ़ से दो बार संसद को भंग करने की सिफ़ारिशों को याद दिलाना था राजनीतिक विश्लेषक हरि शर्मा कहते हैं, ''ओली, दुःस्साहसी और साहसी दोनों हैं. कोई दुःस्साहसी हुए बिना संसद को दो बार कैसे भंग कर सकता है?'' जब ओली ने पहली बार प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफ़ारिश की, उस वक़्त वह प्रधानमंत्री और यूएमएल नेता विद्या भंडारी राष्ट्रपति थीं.

दिसंबर 2020 में प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफ़ारिश करने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने भी इस पर मुहर लगा दी थी.

विपक्षी दलों ने इस क़दम के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि भंग करने का फ़ैसला असंवैधानिक था. साल 2021 में एक बार फिर ओली ने प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफ़ारिश की. फिर से पार्टियों ने रिट दायर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. कोर्ट में ओली के क़दम को फिर ग़लत माना गया. वहीं, कलह बढ़ने पर उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता झलनाथ खनाल, माधव कुमार नेपाल समेत 21 सांसदों ने पार्टी छोड़ दी. साथ ही यूएमएल और माओवादियों के बीच अचानक टूट हो गई. इसके बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) तीन हिस्सों में बँट गई, जिसमें एक तरफ़ ओली के नेतृत्व वाली यूएमएल, दूसरी तरफ यूनिफाइड सोशलिस्ट और तीसरी तरफ़ माओवादी थे.

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