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उत्तर प्रदेश न्यूज़ : गाजियाबाद को वो गांव जहां तमंचे नहीं, होता है 'डोले पर डिस्को'! माताओं की कोख से पहलवान ही लेते हैं जन्म

Abhyuday Bharat News / Tue, May 19, 2026 / Post views : 73

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एक ऐसा गांव, जो अपने अखाड़ों और पहलवानी के लिए जाना जाता है। गाजियाबाद के शाहपुर बम्हेटा गांव में लगभग हर दूसरे घर से एक पहलवान निकलता है।

गाजियाबाद: ये है जिला गाजियाबाद... तोड़ के गिल्ली छोड़ के कंचा थाम लिया जी तमंचा... वैसे तो यह गाना फिल्म 'जिला गाजियाबाद' में फिल्माया गया था, जहां गैंगेस्टर की पार्टी होती है। कहते हैं कि फिल्म का कैरेक्टर कहानियां गढ़ता है। लोगों को कहानी के हिसाब से उस जगह के बारे में सोचने को मजबूर करता है, लेकिन जब बात धरातल की आती है तो आखिरी सच वही होता है, जो आंखों से देखा जाता है। उस जगह पर पहुंचने के बाद जो महसूस किया जाता है वही असल कहानी को बयां करता है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला दिल्ली से सटे गाजियाबाद में नेशनल हाईवे-9 के किनारे बसे एक ऐसा गांव में। गांव का नाम है- शाहपुर बम्हेटा।

नवभारत टाइम्स जब यूपी के इस गांव में पहुंचा. तो देश की असल पहचान से सही मायने में परिचित हुआ। यहां न तो दिल्ली-एनसीआर वाला रौब है, न ही कंकरीट की बड़ी-बड़ी इमारतें, लेकिन यहां जो मिला वो युवाओं का हौसला है, जिन्हें माप पाना नामुमकिन है। वो महान माताएं हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि बच्चा कोख में ही पहलवानी सीख लेता है। तभी तो गांव में एक-दो नहीं, हर घर से पहलवान निकलते हैं।

इस ऐतिहासिक गांव की कहानी लगभग 10वीं शताब्दी से जुड़ी बताई जाती है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि सदियों पहले जब यदुवंशी राजाओं का काफिला यहां से गुजर रहा था, तो उन्होंने एक अनोखा नजारा देखा। एक भेड़िए ने बकरी के बच्चे पर हमला कर दिया था, लेकिन उसकी मां ने हार मानने के बजाय भेड़िए का डटकर मुकाबला किया और उसे भागने पर मजबूर कर दिया। इस घटना को देखकर काफिले के बुजुर्गों ने कहा कि जिस मिट्टी का तिनका खाकर एक बकरी में इतनी ताकत आ सकती है, वह जगह कोई मामूली जगह नहीं हो सकती। उन्होंने इस जगह को 'मर्द खेड़ा' नाम दिया, जो आगे चलकर बम्हेटा कहलाया

आबादी के लिहाज से गाजियाबाद के बम्हेटा गांव में मुख्य रूप से यदुवंशी अहीर यानी यादव समाज की संख्या सबसे ज्यादा है। गांव में प्रधानों का कुनबा सबसे बड़ा और असरदार माना जाता है, जिनके पास पुराने समय से ही काफी जमीनें थीं। 18वीं शताब्दी में कुंवर हमीर सिंह यादव की बनवाई गई 'खेड़े वाली हवेली' के अवशेष आज भी इस गांव के रसूखदार और जमींदारी इतिहास की कहानी बयां करते हैं।

इसी परिवार के सौरभ यादव ने NBT ऑनलाइन से बातचीत में बताया कि बम्हेटा का इतिहास बहुत पुराना है। अब प्रधानी का दौर खत्म हो चुका है और बम्हेटा नगर निगम में शामिल है। अब यहां की व्यवस्थाओं की बागडोर पार्षद के हाथ में रहती है। यादव समाज के अलावा यहां दूसरी जातियों के लोग भी रहते हैं और पूरा गांव आपसी भाईचारे के साथ रहता है। इस गांव में बच्चे के पैदा होते ही उसे सबसे पहले अखाड़े की मिट्टी से रूबरू कराया जाता है, यही वजह है कि कुश्ती यहां के लोगों के खून में बसी है।

शाहपुर बम्हेटा में 12 अखाड़े

कुश्ती के मामले में बम्हेटा किसी बड़ी यूनिवर्सिटी से कम नहीं है। गांव की आबादी करीब 25 हजार है और यहां ज्यादातर घरों में छोटे-बड़े पहलवान मौजूद हैं। पूरे गांव में कुल 12 अखाड़े सक्रिय हैं, जिनमें पानी की टंकी के पास वाला पुराना अखाड़ा और गुरु भीम अखाड़ा बेहद मशहूर हैं। इसके अलावा सबसे बड़ा कुश्ती अखाड़ा बम्हेटा स्टेडियम है।

जीडीए उपाध्यक्ष रहते हुए संतोष यादव ने आठ एकड़ में बने इस अखाड़े का जीर्णोद्धार कराया था। आज इस स्टेडियम में तमाम सुविधाएं मौजूद हैं। इसके संचालक विजयपाल पहलवान बताते हैं कि इस अखाड़े ने जिले से लेकर एशिया लेवल तक के पहलवान दिए हैं। वो खुद राष्ट्रीय स्तर तक पहलवानी कर चुके हैं। उनके यहां वर्तमान में बच्चे से लेकर बड़े तक करीब सौ पहलवान कुश्ती के दाव पेंच सीख रहे हैं।

पहलवान बनने पर आता है कितना खर्च

कोच प्रिंस पांडे बताते हैं कि कुश्ती में एक पहलवान को तैयार होने के लिए कम से कम दस साल चाहिए। उन्होंने बताया कि पहलवानी की ट्रेनिंग लेने वाले बच्चे का एक महीने का खर्चा कम से कम 30 हजार रुपए आता है। इसमें सबसे ज्यादा खर्च उसकी हेल्दी डाइट पर होता है। इसमें दूध, बादाम, दही, प्रोटीन आदि शामिल हैं।

हर रोज शाम होते ही इन अखाड़ों में 'जय बजरंगबली' के नारों के साथ बम्हैटा के युवा मिट्टी में पसीना बहाते नजर आते हैं। इस गांव के दंगलों की साख इतनी बड़ी रही है कि ओलंपिक मेडल विजेता सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे दिग्गज पहलवान भी यहां के अखाड़ों में कुश्ती लड़ने और अभ्यास करने आ चुके हैं।

जगदीश पहलवान ने चमकाया बम्हेटा का नाम

बम्हेटा की मिट्टी ने देश और प्रदेश को 60 से ज्यादा इंटरनेशनल और नेशनल लेवल के पहलवान दिए हैं। गाजियाबाद का नाम अंतरराष्ट्रीय कुश्ती के पटल पर सबसे पहले चमकाने का श्रेय बम्हेटा के जगदीश पहलवान को जाता है, जिन्होंने 1950 के दशक में देश-दुनिया में डंका बजाया और लगातार चार साल तक नेशनल चैंपियन रहे। उनके बाद लाला पहलवान, सत्तन पहलवान, यश भारती व यूपी केसरी से सम्मानित कोच विजयपाल पहलवान सहित कप्तान पहलवान जैसे दिग्गजों ने बम्हेटा का नाम देश के कोने-कोने तक पहुंचाया।

हाल ही में गांव के महज 15 वर्षीय युवा कार्तिक यादव ने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर यह साबित कर दिया कि बम्हेटा का हुनर आज भी जिंदा है।

राजेश पहलवान, संचालक, जगदीश कुश्ती एकेडमी

जगदीश पहलवान के भतीजे राजेश पहलवान अब अपने ताऊ के नाम से गांव में ही जगदीश कुश्ती एकेडमी चला रहे हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी भी गांव की इस परंपरा को बखूबी आगे बढ़ा रही है। हालांकि पहले के मुकाबले अब परिस्थितियां बदली हैं। अभिभावक अब बच्चों को इस हुनर के बजाय एजुकेशन और टेक्निकल कोर्सेज कराने पर जोर दे रहे हैं।

खेल कोटे से पहलवान पा रहे रेलवे, सेना की नौकरी

आज के हालातों की अगर बात करें, तो समय के साथ गाजियाबाद में तेजी से हुए शहरीकरण का असर बम्हेटा पर भी पड़ा है। गांव की खेती की ज्यादातर जमीन वेव सिटी परियोजना के लिए ली जा चुकी है। अब गांव के चारों तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हो गई हैं। हालांकि, जमीनें जाने के बावजूद युवाओं का कुश्ती के प्रति जुनून कम नहीं हुआ है। अब यहां के पहलवान पारंपरिक मिट्टी के अखाड़ों के साथ-साथ बम्हेटा स्टेडियम में आधुनिक मैट पर भी दांव-पेच सीख रहे हैं।

पहलवानी करने वाले ये युवा कुश्ती को सिर्फ शौक नहीं, बल्कि एक बेहतरीन करियर के रूप में देख रहे हैं। कई युवा स्पोर्ट्स कोटे के जरिए रेलवे, पुलिस और सेना जैसी सरकारी नौकरियों में जाकर देश की सेवा कर रहे हैं। बम्हेटा गांव आज इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भी अपनी संस्कृति और खेल परंपरा को कैसे जिंदा रखा जाता है।

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