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नई दिल्ली: क्वाड देशों ने अभी हाल ही में भारत में हुई बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन को दुरुस्त करने के लिए बड़ा फैसला किया है। इसी बीच नई जानकारी ये सामने आ रही है कि क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को पूरी तरह से खत्म करने के लिए करीब 30-40 देश अपना सप्लाई चेन बनाने के लिए अलग से वैकल्पिक रणनीति तैयार कर रहे हैं, जिसमें भारत भी शामिल है।
चीन ने करीब एक साल से प्रमुख और दुर्लभ खनिजों के निर्यात को इतना सख्त कर दिया है कि दुनिया भर में इसके लेकर बहुत ही छपटाहट मची हुई है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि चीन के इस प्रभुत्व को खत्म करने के लिए भारत समेत करीब 30 से 40 देश क्रिटिकल मिनरल्स की वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करने पर काम कर रहे हैं।
भारत के अलावा 30 से 40 अन्य देश चीन से क्रिटिकल मिनरल्स के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एक वैकल्पिक बाजार और सप्लाई चेन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
आधिकारिक सूत्र
रिपोर्ट के अनुसार भारत चिली, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के अलावा अन्य देशों के साथ बातचीत कर रहा है, ताकि महत्वपूर्ण खनिजों ( critical minerals ) की एक मजबूत सप्लाई चेन स्थापित की जा सके।
इन देशों में जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले से ही क्वाड में भारत के साथ इस विषय पर सहयोग कर रहे हैं।
क्वाड में भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका शामिल हैं, जिसके विदेश मंत्रियों ने हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न बैठक में मजबूत क्रिटिकिल मिनरल्स सप्लाई चेन तैयार करने के लिए 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है।
चीन ने जब से क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन को नियंत्रित किया है, अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देशों में इसपर आधारित उद्योगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्टफोन और रक्षा उपकरणों के उत्पादन में इनका इस्तेमाल होता है और चीन दुनिया की इसी कमजोरी का फायदा उठा रहा है।
विश्व के बाकी देश इसके उत्पादन से लेकर इसकी प्रोसेसिंग में काफी पीछे रहे हैं।
लेकिन, अमेरिका और भारत जैसे दुनिया के कई देशों में इसपर काम शुरू किया है, लेकिन इसके लिए आत्मनिर्भर बनना फिलहाल दूर की कौड़ी है, इसलिए ज्यादा से ज्यादा देशों के एक प्लेटफॉर्म पर आने से यह काम आसान हो सकता है।
भारत के पास रिजर्व है, लेकिन इसका इस्तेमाल ज्यादातर बहुत ही खास प्रोजेक्ट में होता है, जैसे कि इसरो के लिए। लेकिन, स्मार्टफोन और वाहनों की ज्यादा आवश्यकताओं के लिए इंडस्ट्री इसे अभी भी चीन से आयात कर रही है।
अन्य आधिकारिक सूत्र
क्रिटिकल मिनरल्स की चीन की कीमतें भी हैं चुनौती
सूत्रों का कहना है कि धीरे-धीरे विकल्प तो खड़ा होने लगा है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती प्रतियोगी कीमतों को लेकर है।
कीमतों की वजह से चीन का अभी भी इसके निर्यात में पूरा दबदबा है।
ऐसे में भारतीय उद्योगों को वैकल्पिक बाजारों की ओर देखने के लिए राजी करना सबसे बड़ी चुनौती है।
आधिकारिक सूत्र ने बताया, 'कीमतों को मैच करना और भारत और इसके साथ मिलकर काम कर रहे पार्टनर देशों से खरीदने के लिए उद्योंगों को राजी कर पाना चुनौतीपूर्ण है।'
भारत उभरते हुए मिनरल्स अलायंस में खुद को एक भरोसेमंद पार्टनर के रूप में स्थापित रने का प्रयास कर रहा है।
अधिकारी ने कहा कि 'संवेदनशील टेक्नोलॉजी खोलने से पहले देशों को हमारे सिस्टम में भरोसा होना जरूरी है।'
महत्वपूर्ण खनिजों में तांबा, लिथियम, निकिल, कोबाल्ट, ग्रेफाइट, एल्युमिनियम, मैंगनीज, सिलिकॉन, चांदी के अलावा, रेअर अर्थ एलिमेंट के अलावा अन्य महत्वपूर्ण मिनरल्स शामिल हैं।
इनमें रेअर अर्थ मिनरल्स की अहमियत चीन की चालबाजियों की वजह से बहुत बढ़ चुकी है।
यह ऐसे खनिज हैं, जिनके बिना आज स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, डिफेंस, एयरोस्पेस, स्पेस से लेकर न्यूक्लियर क्षेत्र के लिए जरूरी उपकरणों की कल्पना भी मुश्कल है।
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