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ABN न्यूज :- देश दुनिया : भारत को 'महाशक्ति' नहीं बनने देगा अमेरिका? चीन वाली गलती नहीं दोहराएगा ....

Abhyuday Bharat News / Fri, Mar 6, 2026 / Post views : 270

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भारत तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है। अमेरिका को यही बात सता रही है। यही वजह है कि अब अमेरिका ने मान लिया है कि वो 20 साल पहले चीन वाली गलती नहीं दोहराएगा। रायसीन डायलॉग में अमेरिकी उप विदेश मंत्री ने अमेरिका का सच सबके सामने रख दिया।

नई दिल्ली: अमेरिका अपने हितों की खातिर कुछ भी कर सकता है। उसके लिए अमेरिका फर्स्ट की नीति पूरी दुनिया पर लागू होती है। दुनिया का दादा बनने का ठेका लिए हुए अमेरिका के लिए चीन उसका बड़ा प्रतिद्वंद्वी है। दुनिया की महाशक्ति बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे चीन को अमेरिका बड़ी चुनौती मानता है। मगर, अमेरिका का सिरदर्द एक और वजह से बढ़ रहा है। दरअसल, भारत तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था बन रहा है। अमेरिका की बड़ी चिंता यही है। इसे समझते हैं।

अमेरिका की खुली पोल, रायसीना डायलॉग में कबूला

  • इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली में भारत के सालाना भू-राजनीतिक समिति पर आयोजित बैठक 'रायसीना डायलॉग' में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी और अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लेंडो ने साफ तौर पर कहा-अमेरिका भारत को वो व्यापक लाभ नहीं देगा, जो कभी उसने चीन को दिए थे।

  • इसका नतीजा यह रहा था कि चीन आज अमेरिका के लिए मुख्य और बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन गया है। उनका यह बयान स्पष्ट रूप से इस बात को समझने के लिए काफी है कि ट्रंप ने भारत के खिलाफ ट्रेड और टैरिफ को लेकर सख्त कदम क्यों उठाए थे। ट्रंप की शर्तें साफतौर पर दिल्ली के उभार के खिलाफ हैं।

क्रिस्टोफर लेंडो ने कहा-आप हमें पछाड़ देंगे

  • क्रिस्टोफर लेंडो ने कहा है कि भारत आज अमेरिका का एक बड़ा पार्टनर है, मगर यह कुछ सीमाओं के साथ है। उन्होंने कहा-भारत को यह समझना चाहिए कि हम वो गलती दोबारा नहीं करने जा रहे हैं, जो हमने 20 साल पहले चीन के साथ की थी।

  • उन्होंने कहा-आप जानते हैं कि हम आपको इन सभी मार्केट को विकसित करने में सक्षम बनाएंगे। फिर अगली बात यह होगी कि हम जानते हैं कि आप हमें बहुत सी वाणिज्यिक चीजों में पछाड़ देंगे।

  • भारत के लिए अमेरिकी मंत्री के बयान के मायने क्या हैं

    • अमेरिका का भारत के लिए साफ संदेश है। अमेरिका अब भारत को मार्केट तक बिना रोकटोक के पहुंच नहीं बनाने देगा। अमेरिका फिर वह गलती नहीं दोहराएगा कि चीन की तरह भारत भी उसके सामने बड़ी आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बन जाए।

    • ऐसा नहीं है कि अमेरिका भारत को चीन की तरह प्रतिद्वंद्वी मानता है। लेकिन, ट्रंप की लेन-देन वाली नीति के तहत पारस्परिकता और अमेरिकी राष्ट्रीय हित ही भारत के साथ उसके संबंधों का मार्गदर्शन करेंगे। ये वही ट्रंप हैं, जिन्होंने बीते साल भारत को डेड इकनॉमी बता डाला था।

    • हालांकि, भारत ने यह दर्शाया है कि उसे आर्थिक तौर पर उभरने के लिए अमेरिका की जरूरत नहीं है। दुनिया में अभी अमेरिका ,चीन और जर्मनी के बाद भारत चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है । उसने इस मामले में जापान को पछाड़कर यह तमगा हासिल किया है और 2030 तक वह जर्मनी को पीछे छोड़ सकता है।


    अमेरिकी उप विदेशमंत्री ने भारत की कर दी तारीफ

    हालांकि, क्रिस्टोफर ने ईमानदारी से तारीफ करते हुए 21वीं सदी में भारत एक निर्णायक शक्ति बनने वाला है। उन्होंने कहा-इस सदी में भारत तेजी से उभर रहा है। भारत में अपार आर्थिक, मानव और अन्य संसाधन हैं, जो इसे उन देशों में से एक बनाएगा जो 21वीं सदी का भविष्य तय करेंगे।

  • अमेरिका की 20 साल पहले वाली गलती क्या थी

    वास्तव में19 वीं सदी में अमेरिका ने चीन को अपने मुताबित ढालना सुरू किया था ।  अमेरिका खुद को चीन का गुरु मानता था और चीन को चेला मानता आया था। चीन ने अमेरिका की मदद जरूर ली, मगर उसने अपना रास्ता बेहद मजबूती से चुना और अमेरिका के विजन को नकार दिया। यहीं से दोनों देशों के रिश्तों में दरार आनी शुरू हो गई थी। 


  • निक्सन के बाद से कई राष्ट्रपतियों से मिली चीन को छूट

    • ऐतिहासिक रूप से रिचर्ड निक्सन के बाद से कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने चीन को आर्थिक छूट देकर आगे बढ़ाया। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही यह पहचान लिया कि चीन अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को नुकसान पहुंचा रहा है।

    • इसके बाद से ही अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर शुरू हो गई। ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में भी चीन के प्रति कोई नरमी नहीं बरती। यह वही अमेरिका था, जिसने चीन को एक आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए बढ़ावा दिया था।

    चीन से जुड़ीं ये पांच गलतियां अमेरिका पर पड़ीं भारी

  • पहली गलती:1990 के दशक से अमेरिका ने अपने विरोधियों के खिलाफ पाबंदियां लगाईं, जिसका फायदा चीन को ही हुआ। जैसे अमेरिकी प्रतिबंधों ने संसाधन संपन्न म्यांमार और ईरान को चीन के साथ संबंध सुधारने के लिए प्रेरित किया।
    दूसरी गलती:साल 2,000 में अमेरिका ने चीन को परमानेंट नॉर्मल ट्रेड रिलेशंस(PNTR) या मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) स्टेटस दिया। इससे अमेरिका में चीनी वस्तुओं के आयात पर बेहद कम टैरिफ लगाए गए, जिसका चीन को जमकर फायदा हुआ।
    तीसरी गलती:2001 में ही अमेरिका ने चीन को विश्व व्यापार संगठन में एंट्री दिलवा दी थी। इससे सस्ती चीन वस्तुओं के लिए पूरी दुनिया का बाजार खुल गया। एक दशक में ही चीन की वस्तुएं पूरी दुनिया में पट गईं। नतीजा यह हुआ कि 2001 में चीन का निर्यात 24.4 लाख करोड़ रुपये था, वो 2010 तक आते-आते छह गुना बढ़कर 145 लाख करोड़ रुपये हो गया। उस वक्त चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश बन चुका था।
    चौथी गलती:चीन की इस तेजी का चेन रिएक्शन तो होना ही था। आईफोन बनाने वाली ऐपल जैसी अमेरिकी कंपनियों ने अपने विर्निर्माण संयंत्रों को चीन शिफ्ट करना शुरू कर दिया। क्योंकि चीन में सस्ती लेबर कास्ट और अनुकूल नीतियां थीं। नतीजा यह रहा कि तकनीक ट्रांसफर और चीन में पूंजीगत प्रवाह खूब बढ़ा। चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया। साथ ही हुवेई जैसी चाइनीज कंपनियां अमेरिका के दबदबे के लिए खतरा बन गईं।
    पांचवीं गलती:एक अन्य कारण व्यापार नियमों का कमजोर प्रवर्तन था, जिन पर अमेरिका ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं। जैसे बौद्धिक संपदा की चोरी और विदेशी कंपनियों के लिए बाजार में बाधाएं। इससे चीनी कंपनियों को धीरे-धीरे विस्तार करने का अवसर मिला।

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