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अमेरिका द्वारा बीजिंग से प्रतिबंध हटाने का आग्रह किए जाने की खबरों के बावजूद चीन ने जापान को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों से बने उत्पादों के निर्यात पर महीनों से जारी प्रतिबंध को और भी कड़ा कर दिया है। इससे 2026 में मार्च और अप्रैल में जापान को चीन का रेयर अर्थ एक्सपोर्ट 80 फीसदी तक गिर गया है। जनवरी में ताइवान पर दोनों एशियाई महाशक्तियों के रुख को लेकर तनाव बढ़ने के बाद चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने जापानी सैन्य उपयोग के लिए बनाए जाने वाले दोहरे उपयोग वाले उत्पादों के निर्यात पर आधिकारिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया था। इनमें रेयर अर्थ भी शामिल हैं। मंगलवार को चीनी सरकार ने फिर से पुष्टि की है कि ये निर्यात प्रतिबंध अभी भी लागू है।
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने दोहराया कि चीनी कानूनों के तहत दुर्लभ पृथ्वी तत्व अभी भी 'दोहरे उपयोग वाले पदार्थ' की श्रेणी में आते हैं, जो सैन्य उद्देश्यों के लिए जापानी सरकार को उनके निर्यात पर रोक लगाते हैं।
हालांकि जापान को होने वाली शिपमेंट रुक गई है, लेकिन हाल के महीनों में चीन के रेयर अर्थ एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी देखी गई है। ताजा कस्टम डेटा के अनुसार, मई में एक्सपोर्ट चार महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। फिर भी, पिछले साल इसी समय की तुलना में एक्सपोर्ट के आंकड़े कम हैं।
एक पुरानी रिपोर्ट का चीन ने दिया ये जवाब
लिन का यह बयान तब आया जब ब्लूमबर्ग ने उनसे निक्केई की एक पुरानी रिपोर्ट के बारे में पूछा। उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अमेरिकी सरकार ने चीन से जापान को रेयर अर्थ मेटल की बिक्री फिर से शुरू करने को कहा था, क्योंकि जापान के टेक्नोलॉजी सेक्टर से जुड़ी ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर चिंताएं थीं।
लिन ने यह भी कहा कि री-मिलिटराइजेशन (फिर से सैन्यीकरण) को रोकने के अलावा, इस कदम का मकसद जापान की परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश को धीमा करना भी था।
चीन का प्रभाव कम करने के लिए बनाई पार्टनरशिप
चीनी एक्सपोर्ट बैन के असर को कम करने के लिए जापान अपने 'ग्रुप ऑफ सेवन' (G7) के साथियों के साथ रेयर अर्थ पार्टनरशिप बनाने की कोशिशें तेज कर रहा है। इनमें फ्रांस और कनाडा के साथ 'त्रिपक्षीय खरीदार' क्लब बनाना और अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ 1.6 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का समझौता करना शामिल है।
चीन के अहम 'रेयर अर्थ मिनरल्स' (दुर्लभ खनिजों) के एक्सपोर्ट पर सख्ती करने के फैसले से ग्लोबल सप्लाई चेन में हलचल मच गई है। इससे इलेक्ट्रिक गाड़ियों और सेमीकंडक्टर से लेकर एडवांस्ड मिसाइल सिस्टम तक में इस्तेमाल होने वाली चीजों की कीमतें बढ़ रही हैं।
बीजिंग ने पिछले साल अप्रैल में एक्सपोर्ट पर ये पाबंदियां लगाई थीं। इनमें सात मीडियम और हेवी 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' शामिल हैं, जैसे कि यट्रियम, टर्बियम और डिस्प्रोसियम। हालांकि इन पाबंदियों में पूरी तरह से रोक नहीं लगाई गई है, लेकिन एक्सपोर्टर्स को इसके लिए खास लाइसेंस लेने पड़ते हैं। इससे देरी होती है और विदेशों में सप्लाई काफी कम हो जाती है।
एयरोस्पेस के पुर्जों, डिफेंस सिस्टम, सेमीकंडक्टर और मेडिकल इक्विपमेंट में इस्तेमाल होने वाले मिनरल 'इट्रियम' की कीमतों में चरन के कंट्रोल की घोषणा के बाद से जबरदस्त उछाल आया है और इसकी कीमत लगभग 1,100 डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।
महंगे हो गए टर्बियम और डिस्प्रोसियम
इलेक्ट्रिक वाहनों और विंड टर्बाइन में इस्तेमाल होने वाले परमानेंट मैग्नेट का एक अहम हिस्सा टर्बियम की कीमत लगभग 350 प्रतिशत बढ़कर करीब 4,500 डॉलर प्रति किलोग्राम हो गई है। इलेक्ट्रिक मोटरों और मिलिट्री कामों में इस्तेमाल होने वाले एक और जरूरी मैग्नेट मटीरियल डिस्प्रोसियम की कीमत भी लगभग 450 प्रतिशत बढ़कर करीब 1,450 डॉलर प्रति किलोग्राम हो गई है।
कीमतों में हुई यह ज़बरदस्त बढ़ोतरी ग्लोबल रेयर अर्थ इंडस्ट्री में चीन की मज़बूत स्थिति को दिखाती है और यह भी बताती है कि दूसरे देशों के लिए चीनी सप्लाई का विकल्प ढूंढना कितना मुश्किल है।
भारत की कमजोरी क्या है
इन पाबंदियों ने पश्चिमी देशों की सप्लाई चेन की एक बड़ी कमज़ोरी को उजागर कर दिया है। हालांकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और भारत जैसे देशों में रेयर अर्थ के भंडार मौजूद हैं, लेकिन इनकी प्रोसेसिंग की क्षमता का ज्यादातर हिस्सा चीन में ही केंद्रित है।
इंडस्ट्री के अनुमान बताते हैं कि दुनिया भर में 'रेयर अर्थ' की प्रोसेसिंग का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा चीन के कंट्रोल में है। इससे बीजिंग का सप्लाई पर काफी असर रहता है, भले ही माइनिंग कहीं और होती हो।
रेयर अर्थ 17 मिनरल्स का एक ग्रुप है जो ड्रोन, टर्बाइन, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी मॉडर्न टेक्नोलॉजी में अहम भूमिका निभाते हैं।
इट्रियम (Yttrium) का इस्तेमाल सेमीकंडक्टर, जेट इंजन कोटिंग, लेजर, रडार सिस्टम और मेडिकल इमेजिंग इक्विपमेंट में किया जाता है। टर्बियम (Terbium) और डिस्प्रोसियम (Dysprosium) ऐसे हाई-परफॉर्मेंस मैग्नेट बनाने के लिए जरूरी हैं जो ज्यादा तापमान झेल सकते हैं। इसी वजह से ये इलेक्ट्रिक व्हीकल, विंड टर्बाइन, एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स और मिलिट्री हार्डवेयर के लिए बहुत अहम हैं।
जैसे-जैसे देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लीन एनर्जी प्रोजेक्ट और डिफेंस क्षमताएं बढ़ाने की होड़ में लगे हैं। इन मैटीरियल की मांग तेजी से बढ़ रही है।
यह मांग ऐसे समय में बढ़ी है जब चीन ने एक्सपोर्ट पर कड़े कंट्रोल लागू किए हैं। इससे सप्लाई की कमी हो गई है और ग्लोबल मार्केट में कीमतें बढ़ रही हैं।
चीन के पास है 44 मिलियन टन रिजर्व
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, चीन के पास लगभग 44 मिलियन मीट्रिक टन रेयर अर्थ रिजर्व हैं। यह दुनिया के दूसरे सबसे बड़े रिजर्व वाले देश, ब्राजील के रिजर्व से दोगुने से भी ज्यादा है। भारत लगभग 6.9 मिलियन मीट्रिक टन के साथ तीसरे स्थान पर है। उसके बाद ऑस्ट्रेलिया का नंबर आता है जिसके पास 5.7 मिलियन मीट्रिक टन रिजर्व हैं।
अमेरिका, यूरोप, जापान और दूसरे देशों की ओर से वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने की कोशिशों के बावजूद, जानकारों का कहना है कि चीन पर निर्भरता कम करने में कई साल लगेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि रेयर अर्थ एलिमेंट्स को रिफाइन और अलग करने के लिए जटिल और ज्यादा पूंजी वाली प्रोसेसिंग सुविधाओं की जरूरत होती है।
भारत का क्या है रेयर अर्थ का प्लान
भारत सरकार ने नवंबर 2025 तक 6,000 MTPA की इंटीग्रेटेड REPM मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना को मंज़ूरी दी है। इसमें रेयर-अर्थ ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक की पूरी वैल्यू चेन शामिल है।
इसके साथ ही, केंद्रीय बजट 2026–27 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में माइनिंग, प्रोसेसिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए 'डेडिकेटेड रेयर अर्थ कॉरिडोर' बनाने की घोषणा की गई है।
'रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट' (REPMs) सबसे मजबूत तरह के परमानेंट मैग्नेट में से एक हैं, जो अपनी ज्यादा मैग्नेटिक ताकत और स्थिरता के लिए जाने जाते हैं। इनका छोटा आकार और ज़बरदस्त परफॉर्मेंस इन्हें एडवांस्ड इंजीनियरिंग कामों के लिए जरूरी बनाता है। जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहन मोटर, विंड टर्बाइन जनरेटर, कंज्यूमर और इंडस्ट्रियल इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस सिस्टम, डिफेंस उपकरण और प्रिसिजन सेंसर।
जैसे-जैसे भारत क्लीन एनर्जी, एडवांस्ड मोबिलिटी और रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ा रहा है। REPMs की भरोसेमंद घरेलू सप्लाई बहुत जरूरी हो गई है। इससे न सिर्फ इंपोर्ट पर निर्भरता कम होती है, बल्कि एडवांस्ड मटीरियल के लिए ग्लोबल वैल्यू चेन में भारत की कॉम्पिटिटिवनेस भी मजबूत होती है।
भारत में क्या रेयर अर्थ के भंडार हैं
भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेयर-अर्थ एलिमेंट्स (REEs) का भंडार है, जो अनुमानित रूप से 6.9 से 7.23 मिलियन टन है। ये मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे तटीय राज्यों की मोनाज़ाइट युक्त समुद्री रेत में, और साथ ही झारखंड के भीतरी इलाकों में पाए जाते हैं।
हालांकि भारत में लाइट रेयर अर्थ एलिमेंट्स (LREEs) जैसे कि सीरियम, लैंथेनम और नियोडिमियम काफी मात्रा में हैं, लेकिन देश में हेवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स (HREEs) की कमी है। साथ ही, इन खनिजों को तैयार मिश्र धातुओं (alloys) और स्थायी चुंबकों (permanent magnets) में बदलने के लिए ज़रूरी घरेलू मिडस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम औद्योगिक सुविधाओं का भी अभाव है।
छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में पहाड़ों के बीच खनिज का भंडार मिला है। महासमुंद के भालूकोना में देश की पहली ऐसी खदान मिली है, जहां बड़ी मात्रा में निकेल, कॉपर और पैलेडियम जैसे दुर्लभ खनिज मौजूद हैं। इनकी लंबाई 1.3 किलोमीटर बताई जा रही है।
डेक्कन गोल्ड माइंस को यह खदान आवंटित की गई है। कंपनी को अभी तक करीब 430 मीटर की लंबाई और 200 मीटर से ज्यादा की गहराई तक निकल, कॉपर और पैलेडियम के भंडार मिल चुके हैं। इस इलाके की मिट्टी में पेंटलैंडाइट, चाल्कोपायराइट और पायरोटाइट सल्फाइड पाए गए हैं।
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#मोदी
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