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Abhyuday Bharat News / Fri, Mar 13, 2026 / Post views : 113
सरल शब्दों में, इसमें जीवन रक्षक प्राणली को हटाना शामिल है, यानी कृत्रिम सहायता के कुछ रूपों को रोकना जो मरीज की स्थिति में सुधार किए बिना जीवन को लंबा खींचते हैं। उदाहरण के लिए, डॉक्टर कृत्रिम पोषण, तरल पदार्थ या अन्य जीवनरक्षक उपायों को तब रोक सकते हैं जब वे लाभकारी न रह जाएं। इसका उद्देश्य जीवन को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उन इलाजों को रोकना है जो केवल पीड़ा को बढ़ाते हैं, और जब ठीक होना संभव न हो तो बीमारी को अपने आप ठीक होने देना है।
डॉक्टर ऐसा तब करते हैं जब इलाज के दौरान मरीज को कोई फायदा नहीं हो रहा होता और उसकी पीड़ा ही बढ़ रही होती है। ऐसे केस में, मेडिकल सहायता जारी रखना मरीज के हित में नहीं हो सकता। इन परिस्थियों में स्थायी कोमा जैसी स्थिति, गंभीर और अपरिवर्तनीय मस्तिष्क क्षति, लाइलाज कैंसर, अंतिम चरण की किडनी फेल्योर जहां डायलिसिस भी प्रभावी नहीं है, या हृदय रोग जहां उपचार के सभी विकल्प समाप्त हो चुके हैं, ऐसे केस शामिल हो सकते हैं। इसमें वेंटिलेटर सपोर्ट हटाना, ब्लड प्रेशर को आर्टिफिशियल रूप से बनाए रखने वाली दवाओं को बंद करना, डायलिसिस, ट्यूबों के माध्यम से आर्टिफिशिय खाना देना, या अन्य हस्तक्षेप शामिल हो सकते हैं जो मरीज की स्थिति में सुधार किए बिना शारीरिक कार्यों को बनाए रखते हैं।
इसके लिए स्थापित मेडिकल मानदंड और टेस्ट हैं। उदाहरण के लिए, कोमा या कोमा जैसी स्थितियों की पुष्टि करने के लिए विशिष्ट उपकरणों का उपयोग किया जाता है। उन्नत कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियों में, इसका पूर्वानुमान और ठीक होने की संभावना का आकलन साक्ष्य-आधारित मेडिकल दिशानिर्देशों का उपयोग करके किया जाता है। भारत में, आमतौर पर कोई भी निर्णय लेने से पहले प्राथमिक और सेकंडरी मेडिकल बोर्ड से समीक्षा की जाती है। कुछ मामलों में, यह सुनिश्चित करने के लिए अस्पताल की नैतिक समितियां भी शामिल हो सकती हैं कि प्रक्रिया मेडिकल नैतिकता और सर्वोच्च न्यायालय की ओर से निर्धारित कानूनी दिशानिर्देशों का पालन करती है। ये उपाय सुनिश्चित करते हैं कि फैसला मेडिकली उचित और नैतिक रूप से सही है।
ये बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर किसी मरीज ने पहले से ही स्पष्ट रूप से बता दिया है कि ऐसी परिस्थितियों में वह किस प्रकार का इलाज चाहता है या नहीं चाहता है, तो डॉक्टर और परिवार उसकी इच्छाओं का पालन कर सकते हैं। मरीज की स्वायत्तता का सम्मान करना मेडिकल नैतिकता का एक मूलभूत सिद्धांत है।
भारत में यह अभी भी अपेक्षाकृत दुर्लभ है। एडवांस डायरेक्टिव के बारे में जागरूकता सीमित है। सांस्कृतिक रूप से, कई परिवारों को मृत्यु को जीवन के एक स्वाभाविक हिस्से के रूप में स्वीकार करना कठिन लगता है।
एक्टिव इच्छामृत्यु में जानबूझकर दवाइयां देकर मौत का कारण बनना शामिल है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु का तात्पर्य उन इलाजों को बंद करना या रोकना है जो आर्टिफिशियली जीवन को बनाए रखते हैं और उन मेडिकल हस्तक्षेप को रोकना है जो अब लाभकारी नहीं हैं। असिस्टेड आत्महत्या में किसी व्यक्ति को अपना जीवन समाप्त करने में सक्रिय रूप से सहायता करना शामिल है। आमतौर पर उसे दवाइयां प्रदान करके जिन्हें वह व्यक्ति स्वयं लेता है।
कई लोग मानते हैं कि इसका मतलब है कि डॉक्टर किसी मरीज की जान लेने की सक्रिय कोशिश कर रहे हैं। असल में, इसमें आमतौर पर उन मेडिकल प्रक्रियाओं को रोकना शामिल होता है जो अब उपयोगी नहीं हैं और जीवन के अंतिम समय में आराम, देखभाल और गरिमा पर ध्यान केंद्रित करना होता है।
मेडिकल नैतिकता नुकसान न पहुंचाने और उन उपचारों से बचने पर जोर देती है जिनसे कोई फायदा नहीं होता। जब इलाज केवल पीड़ा को बढ़ाता है और ठीक होने की कोई वास्तविक संभावना नहीं होती, तो उसे बंद करना नैतिक रूप से उचित माना जा सकता है।
2011 :सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग के लिए इच्छामृत्यु को अस्वीकार कर दिया, जो 1973 में एक क्रूर हमले के बाद से कोमा में थीं, लेकिन सख्त सुरक्षा उपायों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिससे भारत में इस अवधारणा को पहली बार कानूनी मान्यता मिली।
2015 :शानबाग का 42 साल बाद निधन हो गया, उन्होंने चार दशक कोमा में बिताए।
2018 :कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का हिस्सा है और लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) की अनुमति दी।
2023 :सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रियाओं को सरल बनाया, दो-स्तरीय मेडिकल बोर्ड सिस्टम शुरू की और पहले की प्रक्रियात्मक बाधाओं को कम किया।
2026 :सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में कृत्रिम जीवन रक्षक यंत्र हटाने की अनुमति दी, जो भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला कोर्ट-अनुमोदित कार्यान्वयन है।
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