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ईरान की तत्काल मांगन BRIC से इजरायल -अमेरिकी हमले के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास करना हो सकता है। ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है और युद्ध के करीब 2 हफ्ते होने वाले हैं और भारत की तरफ से कोई बयान जारी नहीं किया गया है। ईरान चाहता है कि ब्रिक्स इसपर सख्त बयान जारी करे। ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में भारत के राजदूत रह चुके तल्मीज़ अहमद ने हिंदुस्तान टाइम्स कहा कि 'क्षेत्रीय शांति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी परियोजनाओं और इस क्षेत्र में रहने वाले 1 करोड़ भारतीयों के कल्याण में भारत के दीर्घकालिक हितों को देखते हुए सरकार का रवैया हैरानी की बात है कि काफी उदासीन रहा है।'
पिछले दो वर्षों में हुए घटनाक्रम जिनमें इजरायल पर हमास के हमले, 72,000 लोगों की जान लेने वाला दो साल लंबा गाजा युद्ध और इजरायल और अमेरिका का ईरान पर हमला करना इन सभी बातों पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत थी। संयम बरतने की अपील करने में भारत एक केंद्रीय भूमिका निभा सकता था लेकिन उसकी प्रतिक्रिया आधी-अधूरी रही। हमारे विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने GCC के विदेश मंत्रियों के साथ एक बैठक की थी और जनवरी में अरब लीग के विदेश मंत्रियों के साथ भी एक बैठक की थी। लेकिन जिस तरह की तत्परता और क्षेत्रीय सुरक्षा के संबंध में एक साझा दृष्टिकोण होने का जो एहसास उभरना चाहिए था वैसा कुछ भी देखने को नहीं मिला।
तल्मीज़ अहमद, पूर्व राजदूत, ओमान, सऊदी अरब, UAE
इसके अलावा उन्होंने कहा कि 'संघर्ष शुरू होने से ठीक पहले PM मोदी की इजरायल यात्रा ने एक तरह के जुड़ाव का संकेत दिया। जब रणनीतिक स्तर पर बड़े उथल-पुथल का दौर चल रहा हो तो हम किसी का पक्ष नहीं लेते हैं। आपको अपने विकल्प खुले रखने चाहिए।' यानि तल्मीज़ अहमद का तर्क है कि भारत का रवैया बहुत 'अलग-थलग' रहा है। जहां भारत एक वैश्विक शक्ति बनने का दावा करता है वहां इतने बड़े क्षेत्रीय संकट पर उसकी भूमिका 'आधी-अधूरी' दिख रही है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान सिर्फ दोस्ती के नाते होर्मुज रास्ता भारत के लिए नहीं खोलेगा। वह होर्मुज में रियायत देने के बदले अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे UN या BRICS पर भारत से मजबूत समर्थन मांग सकता है। भारत ऐसा नहीं करेगा जो इजरायल और अमेरिका के खिलाफ उसे खड़ा कर दे।
इसके अलावा एक दिक्कत और है। तेहरान के साथ डिप्लोमेसी में सबसे बड़ी बाधा यह है कि ईरान के विदेश मंत्री से बात करना काफी नहीं है। वास्तविक ऑपरेशंस IRGC के हाथ में हैं जिन पर वहां की नागरिक सरकार का नियंत्रण सीमित है। होर्मुज और सैन्य ऑपरेशंस पर असली पकड़ IRGC की है। तल्मीज अहमद के मुताबिक नागरिक लीडरशिप का IRGC पर प्रभाव कम है। यानी जयशंकर जिससे बात कर रहे हैं जरूरी नहीं कि ग्राउंड पर उसका असर भी हो। यही कारण है कि 4 बार की बातचीत के बाद भी समुद्री सुरक्षा को लेकर कोई ठोस गारंटी नहीं मिल पा रही है।
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भारत की तरफ से अभी तक जो भी टेलीफोन कॉल किए गये हैं उसमें कोई ठोस शांति प्रस्ताव पेश नहीं किया गया है। भारत ने मिडिल ईस्ट में ईरान के हमलों की निंदा की है लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या की निंदा नहीं की है। इससे ये संदेश जा रहा है कि भारत सिर्फ अपने हितो को लेकर ही चिंतित है और क्षेत्र की स्थिरता में सक्रिय भूमिका नहीं निभा रहा जबकि भारत खुद को ग्लोबल साउथ के लीडर की तरह पेश कर रहा है।
जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को सिर्फ शब्दों से आगे बढ़कर कुछ कदम उठाने पड़ सकते हैं जिसमें सबसे पहला ब्रिक्स का बयान होगा। क्योंकि अगर होर्मुज बंद रहा और इराक से तेल आना बंद हुआ तो भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। इसके अलावा भारत रूस या सऊदी अरब के साथ मिलकर एक ऐसा 'मध्यस्थ' समूह बना सकता है जो ईरान और इजरायल के बीच तनाव कम करने के लिए काम करे। लेकिन क्या भारत कोई दिखने वाला कदम उठाएगा ये देखने वाली बात होगी।
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