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Abhyuday Bharat News / Fri, Mar 6, 2026 / Post views : 242
बरसाना मे होली समापन केवल रंगों का अंत नहीं बल्कि जीवन की नश्वरता और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संगम है। गोस्वामी समाज द्वारा समाज गायन का अंतिम पद गाया गया। "जो जीवैगो सो खेलेगौ, ढप धर दै यार गई अगली बरस की।" इस पद के गायन के साथ ही मृदंग और झांझ जैसे वाद्ययंत्रों को विधिवत समेटकर अगले वर्ष के लिए सुरक्षित रख दिया गया। इस रस्म का अर्थ यह है कि अब होली का समय बीत चुका है और जो अगले वर्ष तक जीवित रहेगा, वही फिर से इस आनंद को प्राप्त करेगा।
करीब 2 घंटे तक संगमरमर की सफेद छतरी में दर्शन देने के बाद सेवायत डोले को दोबारा मंदिर के मुख्य गर्भगृह ले गए। इसके बाद गोस्वामी समाज की कन्याओं द्वारा विशेष आरती की गई।
40 दिनों तक चलने वाले इस रंगोत्सव में फाग,धमार और राधा कृष्ण की लीलाओं का जो रस बहा, उसने हर श्रद्धालु को भक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। अंतिम दिन भी श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। हर कोई श्यामा प्यारी की एक झलक पाने को बेताब नजर आया।
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