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नतीजों के रुझानों के बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, बंगाल में हिंदू- मुसलमान हो गया। बंगाल में फिर बाबरी मस्जिद बनाने की चर्चा ने चुनाव के नैरेटिव को बदल दिया। ममता बनर्जी पर पहले से मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लग रहे थे। इससे हिंदू मतों का ध्रुवीकरण बीजेपी की तरफ हो गया। इसके पहले पश्चिम बंगाल में तय पैटर्न पर वोटिंग होती थी। ममता बनर्जी यह मान कर चलती थीं कि 30 फीसदी वोट (मुस्लिम मत) तो उनके सुनिश्चित हैं। अगर हिंदू मतों को विभाजित कर देंगी तो उनकी जीत तय है। हिंदू मतों में विभाजन के लिए उन्होंने भद्रलोक को अपने पाले में कर लिया। भद्रलोक खुद पढ़ा-लिखा और धर्मनिरपेक्ष मान कर ममता बनर्जी के साथ हो गया। इससे तृणमूल कांग्रेस लगातार तीन चुनाव जीत गयी।
लेकिन भद्रलोक का मोह भंग तब हुआ जब तृणमूल की तथाकथित गुंडा वाहिनी ने अराजकता और अत्याचार शुरू कर दिया। आरजी कार मेडिकल कॉलेज की छात्रा की रेप के बाद हत्या की गयी थी। इस घटना ने पश्चिम बंगाल को हिला दिया था। लेकिन ममता सरकार का जो रवैया रहा उससे आम लोगों को बहुत झटका लगा। आरोप लगा कि महिला हो कर भी ममता बनर्जी ने एक पीड़ित महिला को न्याय नहीं दिलाया। उन पर आरोपियों को बचाने के आरोप लगे। इन बातों से पढ़ा लिखा- भद्रलोक अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित हो गया। वे बीजेपी के वोटर नहीं थे, फिर भी कमल की तरफ देखने लगे। बीजेपी ने रेप पीड़िता की मां को पनिहाटी से उम्मीदवार बना कर महिला सुरक्षा को बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया।
अमित शाह की कुशल रणनीतिऔर नरेन्द्र मोदी के नाम ने पश्चिम बंगाल के चुनाव को पूरी तरह पलट दिया। पश्चिम बंगाल जीतने के लिए अमित शाह ने जो मेहनत की वह चर्चा का विषय है। वे 15 दिनों तक पश्चिम बंगाल में जमे रहे। रात के 1-2 बजे तक काम करते रहे। एक-एक सीट के लिए दिन रात गुणा-भाग करते रहे। उन्होंने कुल 50 चुनावी कार्यक्रम किये। इस मेहनत ने बीजेपी को अपनी कमियों को सुधारने का मौका मिला। कार्यकर्ताओं में एक नया जोश पैदा हुआ। इस जीत का अधिकतम श्रेय अमित शाह को जाता है। यह चुनाव केवल मोदी के नाम पर नहीं जीता जा सकता था। जमीन पर कम करना बहुत जरूरी थी। तृणमूल की तथाकथित गुंडा वाहिनी से निपटना बेहद जरूरी थी क्यों कि उनके डर के कारण बीजेपी समर्थक वोट नहीं डाल पाते।
पश्चिम बंगाल में भयमुक्त और निष्पक्ष चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने भी बहुत मुस्तैदी दिखायी। कड़क आइपीएस अधिकारी अजय पाल सिंह को चुनाव पर्यवेक्षक बना कर पश्चिम बंगाल भेजना इसकी एक बानगी है। फ्री एंड फेयर इलेक्शन के लिए पश्चिम बंगाल में 2 लाख 40 हजार से अधिक केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवान तैनात किये गये। वह भी चुनाव से एक दो सप्ताह पहले। इससे तृणमूल की तथाकथित गुंडा वाहिनी, वोटरों को डरा-धमका नहीं सकीं। वोटरों को सुरक्षा मिली तो उन्होंने खुल कर मतदान किया। बंपर वोटिंग ने बीजेपी की किस्मत बदल दी। अमित शाह ने रणनीति बनायी थी कि जितने भी बीजेपी के वोटर हैं वे 11-12 बजे तक अपना वोट डाल दें। गुंडा तत्व दोपहर बाद ही सक्रिय होते हैं। लेकिन मतदान के दिन गुंडे बिल्कुल भी नजर नहीं आये। सुरक्षा बलों की सख्ती से वे बहुत डर गये थे। गुंडों पर रोक लगी तो बीजेपी के वोटर घरों से निकल बूथ तक आये।
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