विश्व आदिवासी दिवस पर अस्मिता, अधिकार, प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान से समावेशी विकास की ओर
✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ
एक वनग्राम की सुबह है। पगडंडी से एक महिला टोकरी लेकर गुजर रही है। उसके लिए जंगल केवल पेड़ों का विस्तार नहीं है। वह आजीविका है, स्मृति है, जीवन का आधार है और पीढ़ियों से अर्जित प्रकृति बोध की पाठशाला है।
उसी गाँव का एक बच्चा विद्यालय में पर्यावरण विज्ञान पढ़ रहा है। किताब उसे बताती है कि जैव-विविधता क्या है; उसके आसपास का जंगल उसे यह बात जीकर दिखाता है। उसके लिए प्रकृति किसी अध्याय का विषय नहीं, जीवन का हिस्सा है।
यहीं से एक प्रश्न जन्म लेता है,
क्या हमारी शिक्षा, हमारी विकास-दृष्टि और हमारी आधुनिकता उस ज्ञान को पर्याप्त महत्व दे रही है, जिसे समुदायों ने पीढ़ियों से अपने जीवन में सँजोया है?
विश्व आदिवासी दिवस इसी प्रश्न पर ठहरकर सोचने का अवसर देता है।
9 अगस्त को मनाया जाने वाला यह दिवस विश्व के आदिवासी समुदायों की पहचान, अधिकार, संस्कृति और गरिमा के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता की याद दिलाता है। वर्ष 2026 में संयुक्त राष्ट्र ने “आदिवासी दाइयों का सम्मान : जीवन और कल्याण की रक्षा” को विषय बनाया है। यह विषय पारंपरिक ज्ञान, सामुदायिक स्वास्थ्य, महिलाओं की भूमिका और पीढ़ियों से हस्तांतरित जीवन-अनुभव को नए संदर्भ में समझने का अवसर देता है।
लेकिन इस दिवस का अर्थ केवल आदिवासी समाज को याद करना नहीं है। इसका गहरा अर्थ तब सामने आता है, जब हम स्वयं से पूछें, क्या आदिवासी समाज केवल हमारी विरासत है, या भारत के भविष्य को समझने की एक महत्वपूर्ण दृष्टि भी?
1. आँकड़ों के पीछे करोड़ों जीवन :
भारत में अनुसूचित जनजातियों की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 10.45 करोड़ थी, उस समय देश की कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत।
लेकिन 10.45 करोड़ केवल एक संख्या नहीं है। इसके पीछे करोड़ों जीवन हैं, बच्चे, जिनकी अपनी आकांक्षाएँ हैं; युवा, जो शिक्षा और रोजगार के नए अवसर तलाश रहे हैं; महिलाएँ, जो परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं; किसान, कारीगर और वन-आधारित आजीविका से जुड़े परिवार; और बुजुर्ग, जिनकी स्मृतियों में लोककथाएँ, गीत, प्रकृति-बोध और पीढ़ियों का अनुभव सुरक्षित है।
आदिवासी समाज भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक विविधता का कोई हाशिये का अध्याय नहीं है। वह भारत की बहुलतापूर्ण पहचान का जीवंत हिस्सा है।
फिर भी बदलती अर्थव्यवस्था, शिक्षा, बाजार और विकास प्रक्रियाओं ने अनेक समुदायों के सामने आजीविका, स्वास्थ्य, शिक्षा, भाषा, सांस्कृतिक निरंतरता और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों की नई चुनौतियाँ खड़ी की हैं।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि आदिवासी संस्कृति को कैसे बचाया जाए? बड़ा प्रश्न यह है, क्या हम ऐसा भारत बना सकते हैं, जहाँ विकास पहचान को मिटाए नहीं, बल्कि उसे साथ लेकर आगे बढ़े?
2. जल, जंगल, जमीन : नक्शे से आगे की दुनिया
किसी सरकारी नक्शे पर जंगल एक हरा क्षेत्र हो सकता है और जमीन एक भूखंड। लेकिन किसी आदिवासी परिवार के लिए वही जंगल भोजन, औषधि, आजीविका, संस्कृति और स्मृतियों का संसार हो सकता है।
जिस नदी से गाँव पानी लेता है, उसके किनारे केवल जल नहीं बहता; वहाँ बचपन की स्मृतियाँ, सामुदायिक जीवन और स्थानीय संस्कृति भी आकार लेती है।
जिस जंगल से परिवार वनोपज प्राप्त करता है, उससे केवल आय नहीं जुड़ी होती; उसके साथ पीढ़ियों का अनुभव और प्रकृति को समझने की दृष्टि भी जुड़ी होती है।
इसलिए प्राकृतिक परिवेश में बड़ा परिवर्तन केवल आर्थिक प्रभाव नहीं लाता। विस्थापन केवल घर बदलना नहीं है। उसके साथ परिचित रास्ते, सामुदायिक संबंध, सांस्कृतिक स्थल, स्मृतियाँ और प्रकृति को समझने की पीढ़ियों पुरानी दृष्टि भी प्रभावित हो सकती है।
भारत में वन अधिकार अधिनियम, 2006 और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 पेसा स्थानीय समुदायों के अधिकार और सहभागिता के महत्वपूर्ण कानूनी आधार हैं। लेकिन कानून की वास्तविक शक्ति तभी दिखाई देती है, जब अधिकार कागज से निकलकर जीवन में दिखाई दें।
इसलिए विकास का प्रश्न केवल यह नहीं कि जमीन का उपयोग कैसे हो; यह भी है कि उस जमीन से जुड़े लोगों की आवाज निर्णय प्रक्रिया में कितनी सुनी गई।
वह विकास अधूरा है, जिसमें आँकड़े बढ़ें, लेकिन मनुष्य और प्रकृति दोनों पीछे छूट जाएँ।
3. प्रकृति का ज्ञान : अतीत नहीं, भविष्य की शक्ति
आज दुनिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के क्षरण, जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में आदिवासी समुदायों के पारंपरिक प्रकृति-ज्ञान को नए दृष्टिकोण से समझना उपयोगी हो सकता है।
स्थानीय मौसम की पहचान, बीजों की विविधता, जलस्रोतों की देखभाल, वनस्पतियों की पहचान, स्थानीय कृषि पद्धतियाँ और वन आधारित आजीविका, इन सबमें पीढ़ियों के अनुभव की छाप दिखाई देती है।
लेकिन पारंपरिक ज्ञान का सम्मान वैज्ञानिक विवेक को छोड़ देना नहीं है।
किसी परंपरागत उपचार को केवल परंपरा के आधार पर वैज्ञानिक सत्य नहीं माना जा सकता। उसी तरह किसी स्थानीय ज्ञान को केवल इसलिए खारिज भी नहीं किया जाना चाहिए कि वह आधुनिक प्रयोगशाला में विकसित नहीं हुआ।
सार्थक रास्ता है दस्तावेजीकरण, संवाद, वैज्ञानिक परीक्षण और समुदाय की भागीदारी। प्रकृति पर अधिकार की भाषा से प्रकृति के साथ संबंध की भाषा तक पहुँचना हमारे समय की बड़ी आवश्यकता है।
परंपरा और आधुनिकता को विरोधी ध्रुव मानने के बजाय उनके बीच संवाद की संभावनाएँ खोजनी होंगी।
4. अधिकार : कागज से जीवन तक
अधिकारों की चर्चा अक्सर कानूनों, योजनाओं और सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसी समुदाय के लिए अधिकार का वास्तविक अर्थ कहीं अधिक मानवीय है।
इसका अर्थ है, अपने जीवन से जुड़े निर्णयों में अपनी आवाज होना; अपनी भूमि और संसाधनों से संबंधित मामलों में सुना जाना; शिक्षा और स्वास्थ्य तक सम्मानजनक पहुँच; और अपनी पहचान के साथ आगे बढ़ने का अवसर।
भारतीय संविधान ने अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए अनेक विशेष प्रावधान किए हैं। पाँचवीं और छठी अनुसूची, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा शिक्षा और रोजगार में आरक्षण सामाजिक न्याय की संवैधानिक दृष्टि के महत्वपूर्ण अंग हैं।
लेकिन किसी अधिकार की वास्तविक शक्ति उसके अस्तित्व से अधिक उसके क्रियान्वयन में होती है। अधिकार तभी जीवित होता है, जब वह मनुष्य के जीवन में दिखाई देता है।
इसीलिए आदिवासी अधिकारों का प्रश्न केवल कल्याण का प्रश्न नहीं है। यह न्याय, गरिमा, समान अवसर और सहभागिता का प्रश्न है।
लाभार्थी से भागीदार तक की यात्रा ही वास्तविक सशक्तीकरण की यात्रा है।
5. शिक्षा : जब किताब और जीवन मिलें
अधिकार जीवन की सुरक्षा करते हैं; शिक्षा उस जीवन को नई संभावनाओं की दिशा देती है।
किसी आदिवासी बच्चे के लिए विद्यालय ऐसा स्थान होना चाहिए, जहाँ उसकी अपनी दुनिया और व्यापक दुनिया के बीच संवाद स्थापित हो।
वह बच्चा वर्षों से पेड़ों, पक्षियों, मिट्टी, वर्षा और मौसम को देखता आया है। विद्यालय में उसे पहली बार पारिस्थितिकी शब्द मिलता है। यदि शिक्षक उसके अनुभव को विज्ञान की अवधारणा से जोड़ देता है, तो पाठ्यपुस्तक उसके लिए जीवन से अलग कोई चीज नहीं रहती।
यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है, अनुभव को ज्ञान में और ज्ञान को दृष्टि में बदलना।
आदिवासी शिक्षा में स्थानीय भाषा, स्थानीय परिवेश और समुदाय के अनुभवों को स्थान देना आधुनिक ज्ञान से दूरी बनाना नहीं है। यह बच्चों को अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए व्यापक दुनिया को समझने की क्षमता देना है।
6. भाषा : शब्दों के साथ एक दुनिया
किसी बुजुर्ग के पास अपने समुदाय की ऐसी कहानी हो सकती है, जो उन्होंने अपने माता पिता से सुनी हो। लेकिन यदि अगली पीढ़ी उस भाषा को समझना बंद कर दे, तो कहानी मौजूद रहते हुए भी उसका अर्थ धीरे-धीरे दूर होने लगता है।
यहीं भाषा संरक्षण का मानवीय अर्थ सामने आता है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं। उसमें किसी समुदाय की स्मृतियाँ, लोककथाएँ, गीत, प्रकृति बोध और दुनिया को देखने की विशिष्ट दृष्टि भी रहती है।
एक भाषा का मौन होना, एक पूरी दुनिया की आवाज का धीमा पड़ जाना है।
स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री, डिजिटल शब्दकोश, लोककथाओं का दस्तावेजीकरण, ई पुस्तकें और डिजिटल अभिलेख इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
तकनीक यहाँ चुनौती भी है और अवसर भी। वही डिजिटल माध्यम किसी भाषा को हाशिये पर धकेल सकता है और वही उसे दर्ज, संरक्षित तथा अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का साधन भी बन सकता है।
7. आदिवासी महिलाएँ : अनुभव की जीवित पाठशाला
वर्ष 2026 की संयुक्त राष्ट्र थीम आदिवासी दाइयों को विशेष रूप से केंद्र में रखती है। यह उन महिलाओं की ओर देखने का अवसर देती है जिनके अनुभव में पीढ़ियों का सामुदायिक ज्ञान संचित है।
किसी गाँव की एक वृद्ध दाई के जीवन में गर्भावस्था, प्रसव, नवजात की देखभाल और सामुदायिक स्वास्थ्य से जुड़ी अनेक परंपराओं का अनुभव हो सकता है। उसका ज्ञान किसी पुस्तक में पूरी तरह दर्ज न भी हो, फिर भी वह उसके जीवन अनुभव में सुरक्षित है।
लेकिन परंपरा का सम्मान वैज्ञानिक सुरक्षा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। जरूरत है कि पारंपरिक ज्ञान को सुना जाए, उसका दस्तावेजीकरण हो, उसके उपयोगी पक्षों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाए और सुरक्षित आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ उसका संवाद स्थापित किया जाए।
परंपरा का सम्मान तभी सार्थक है, जब वह जीवन की रक्षा और गरिमा की वृद्धि करे।
आदिवासी महिलाएँ केवल पारंपरिक ज्ञान की वाहक नहीं हैं। वे कृषि, वनोपज, हस्तशिल्प, परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए महिला सशक्तीकरण को शिक्षा, स्वास्थ्य, नेतृत्व और निर्णय निर्माण में भागीदारी से जोड़ना होगा।
8. युवा : विरासत से भविष्य तक
आज का आदिवासी युवा एक साथ दो दुनियाओं के बीच खड़ा है। एक ओर भाषा, संस्कृति और समुदाय की विरासत है; दूसरी ओर आधुनिक शिक्षा, तकनीक, उद्यमिता और वैश्विक अवसरों की दुनिया। यह चुनाव परंपरा या आधुनिकता का नहीं होना चाहिए।
एक युवा अपनी भाषा बचाते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता सीख सकता है। पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ सकता है। स्थानीय कृषि ज्ञान को नई तकनीक के साथ प्रयोग कर सकता है। अपने गाँव में रहते हुए डिजिटल माध्यम से दुनिया से जुड़ सकता है।
जब स्थानीय प्रतिभा को स्थानीय अवसर मिलते हैं, तब विकास केवल बाहर से नहीं आता, वह भीतर से जन्म लेता है।
इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उच्च शिक्षा, कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता, उद्यमिता, खेल और रोजगार के अवसरों का विस्तार आवश्यक है।
तकनीक की सफलता केवल उसकी गति से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि वह कितने लोगों को सम्मानपूर्वक साथ लेकर आगे बढ़ती है।
9. छत्तीसगढ़ : स्थानीय अनुभव, राष्ट्रीय सीख
छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, जैव विविधता और प्राकृतिक परिवेश से गहराई से जुड़ी है। यहाँ प्रकृति अनेक समुदायों के जीवन, आजीविका और सांस्कृतिक स्मृति का अभिन्न हिस्सा है।
वन आधारित आजीविका, लघु वनोपज, स्थानीय कृषि, हस्तशिल्प, लोककला और पारंपरिक ज्ञान को यदि शिक्षा, अनुसंधान, आधुनिक प्रसंस्करण और न्यायपूर्ण बाजार से जोड़ा जाए, तो सांस्कृतिक संरक्षण और आर्थिक अवसर एक दूसरे के पूरक बन सकते हैं।
लेकिन इसकी बुनियादी शर्त है, जिस समुदाय का ज्ञान है, उसकी आवाज और भागीदारी भी सुनिश्चित हो। किसी समुदाय के ज्ञान को उसके समुदाय से अलग करके केवल बाजार की वस्तु बना देना संरक्षण नहीं है।
ज्ञान का सम्मान तभी पूरा होता है, जब ज्ञान के वाहक की गरिमा और हिस्सेदारी भी सुरक्षित रहे।
छत्तीसगढ़ का अनुभव राष्ट्रीय विकास विमर्श के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ प्रकृति, संस्कृति, आजीविका और विकास के प्रश्न एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते।
10. विकास : कितना नहीं, किस दिशा में?
हम अक्सर पूछते हैं, कितनी सड़कें बनीं, कितना उत्पादन बढ़ा, कितनी बिजली पैदा हुई, कितनी आय बढ़ी?
ये प्रश्न आवश्यक हैं। लेकिन इनके साथ कुछ और प्रश्न भी होने चाहिए :
क्या जंगल सुरक्षित रहे?
क्या स्थानीय आजीविका मजबूत हुई?
क्या बच्चों की शिक्षा बेहतर हुई?
क्या महिलाओं की भागीदारी बढ़ी?
क्या भाषा और संस्कृति जीवित रही?
क्या विकास के निर्णयों में समुदाय की आवाज सुनी गई?
यही प्रश्न विकास की गुणवत्ता को मापते हैं।
विकास की असली परीक्षा केवल यह नहीं कि वह कितना बनाता है; यह भी है कि वह क्या बचाकर रखता है।
आदिवासी जीवन दृष्टि आधुनिक भारत के सामने एक महत्वपूर्ण संभावना रखती है। आर्थिक प्रगति, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को एक दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उन्हें एक साझा विकास दृष्टि में देखा जाए।
11. विरासत को संग्रहालय नहीं, जीवन चाहिए :
किसी संस्कृति को बचाने का सबसे अच्छा तरीका उसे संग्रहालय में बंद कर देना नहीं है।
संस्कृति तब जीवित रहती है, जब उसकी भाषा बोली जाती है, उसके गीत अगली पीढ़ी तक पहुँचते हैं, उसके शिल्प को सम्मानजनक बाजार मिलता है और उसके ज्ञान को नए संदर्भों में उपयोगी बनने का अवसर मिलता है।
एक बुजुर्ग की स्मृति तभी अगली पीढ़ी की संपत्ति बनती है, जब कोई बच्चा उसे सुनने के लिए बैठता है। एक लोकगीत तभी जीवित रहता है, जब कोई युवा उसे गाता है। एक भाषा तभी जीवित रहती है, जब बच्चे उसे बोलते हैं। और पारंपरिक ज्ञान तभी जीवित रहता है, जब वह सम्मानपूर्वक आधुनिक ज्ञान से संवाद करता है।
संरक्षण का अर्थ अतीत को रोक देना नहीं; उसे भविष्य से जोड़ देना है।
12. दया से अधिकार, लाभार्थी से भागीदार तक :
विश्व आदिवासी दिवस हमें आदिवासी समाज के बारे में बोलने से आगे बढ़कर उसे सुनने का अवसर देता है । उनके लिए योजनाएँ बनाने से आगे बढ़कर उनके साथ योजनाएँ बनानी होंगी।
उनकी संस्कृति को केवल प्रदर्शित करने से आगे बढ़कर उसकी जीवन्तता सुनिश्चित करनी होगी। उनके पारंपरिक ज्ञान की प्रशंसा करने से आगे बढ़कर उसे शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और सम्मानजनक आर्थिक अवसरों से जोड़ना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण यह स्वीकार करना होगा कि आदिवासी समाज विकास की यात्रा का यात्री भर नहीं है। वह इस यात्रा की दिशा तय करने वाला साझेदार भी है।
सम्मान का सबसे ऊँचा रूप किसी के लिए बोलना नहीं, उसके साथ मिलकर भविष्य लिखना है।
12. जड़ों से शक्ति, भविष्य की ओर :
फिर उसी बच्चे की कल्पना कीजिए, जिससे यह लेख शुरू हुआ था।
वह आधुनिक विद्यालय में पढ़ता है। विज्ञान और तकनीक सीखता है। डिजिटल दुनिया से जुड़ता है। लेकिन वह अपनी दादी की भाषा भी समझता है। उसे अपने गाँव के जंगल की पहचान है। वह अपने समुदाय की कहानी जानता है। वह अपनी संस्कृति को अतीत का बोझ नहीं, अपनी पहचान और शक्ति मानता है।
यही वह भारत हो सकता है, जिसमें आधुनिकता और परंपरा एक दूसरे की विरोधी नहीं, सहयात्री हों।
भारत का भविष्य केवल महानगरों में नहीं लिखा जा रहा। वह उन जंगलों, पहाड़ियों, नदियों और गाँवों में भी आकार ले रहा है, जहाँ पीढ़ियों से समुदाय प्रकृति के साथ जीवन का संतुलन साधते आए हैं।
इसलिए विश्व आदिवासी दिवस पर हमारा संकल्प केवल आदिवासी संस्कृति को बचाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमें ऐसा भारत बनाना होगा जहाँ :
अधिकार हों, लेकिन गरिमा के साथ;
विकास हो, लेकिन प्रकृति के साथ;
आधुनिक शिक्षा हो, लेकिन जड़ों से जुड़ी हुई;
तकनीक हो, लेकिन समावेशी;
और प्रगति हो, लेकिन किसी समुदाय की पहचान की कीमत पर नहीं।
अंततः यह केवल आदिवासी समाज का प्रश्न नहीं है।यह उस भारत का प्रश्न है, जिसे हम आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ना चाहते हैं।
आदिवासी समाज केवल भारत की स्मृति नहीं है; वह हमें यह याद दिलाने वाली जीवित दृष्टि है कि भविष्य की ओर बढ़ते हुए अपनी जड़ों को पीछे छोड़ना आवश्यक नहीं।
13. संदर्भ-स्रोत :
संयुक्त राष्ट्र; संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक मामलों का विभाग; भारत सरकार, जनजातीय कार्य मंत्रालय; भारत की जनगणना 2011, भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त का कार्यालय; वन अधिकार अधिनियम, 2006; पेसा अधिनियम, 1996।