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डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान बिलासपुर छत्तीसगढ़
शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ
भारत में शिक्षा का प्रश्न केवल रोजगार, परीक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है; यह उस सभ्यतागत दिशा से भी जुड़ा हुआ है, जिस पर किसी राष्ट्र का सांस्कृतिक भविष्य निर्मित होता है। आज जब देश के अनेक विद्यालयों में फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश और जापानी जैसी विदेशी भाषाएं आधुनिकता, प्रतिष्ठा और वैश्विक अवसरों की पहचान बन चुकी हैं, वहीं संस्कृत, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को अतिरिक्त शैक्षणिक बोझ की तरह देखा जाने लगा है। यह परिवर्तन केवल शिक्षा व्यवस्था में बदलाव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है।
किसी राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के हृदय और आत्मा में बसती है। यदि कोई समाज अपनी भाषाई विरासत को केवल बाजार और उपयोगिता की कसौटी पर मापने लगे, तो संकट केवल भाषा का नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक स्मृति का होता है।
जब किसी राष्ट्र की नई पीढ़ी अपनी भाषा से दूर होने लगे, तब संकट केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि उस राष्ट्र की आत्मा का होता है।
1. भारत की शक्ति उसकी भाषाई बहुलता में निहित है :
भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और परंपराओं का जीवंत सभ्यतागत महासंगम है। यहां भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास, ज्ञान, विचार, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता की संवाहक है।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा था - भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सभ्यता की चेतना है। यही कारण है कि भारत जैसे बहुभाषी समाज में शिक्षा की भाषा सदैव राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र रही है।
2. त्रिभाषा नीति की मूल भावना क्या थी? :
1964-66 के कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए त्रिभाषा फार्मूले की अवधारणा प्रस्तुत की। उद्देश्य स्पष्ट था - प्रत्येक विद्यार्थी अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, एक अन्य भारतीय भाषा तथा अंग्रेज़ी सीखे ताकि विविध भाषाई समुदायों के बीच संवाद, परस्पर समझ और राष्ट्रीय एकता मजबूत हो सके।
मूल विचार यह था कि भारत की विविधता विभाजन का कारण नहीं, बल्कि एक बड़े सांस्कृतिक संवाद की आधारशिला बने।
3. राजनीति ने भाषा नीति को कैसे जटिल बनाया?
यह नीति जितनी दूरदर्शी थी, उतनी ही शीघ्र राजनीतिक विवादों में उलझ गई। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में इसे हिंदी थोपने के प्रयास के रूप में देखा गया। दूसरी ओर उत्तर भारत ने भी इसकी मूल भावना को गंभीरता से नहीं अपनाया और अनेक राज्यों ने दक्षिण भारतीय भाषाओं के स्थान पर संस्कृत को जोड़कर औपचारिकता भर पूरी कर दी।
किसी समाज की एकता केवल कानून से नहीं, बल्कि साझा चेतना से बनती है। परिणामस्वरूप भाषाई समन्वय का मूल उद्देश्य अधूरा रह गया।
विडंबना यह रही कि इस पूरे विवाद में सबसे अधिक प्रभावित वही भाषा हुई, जिसने भारत की बौद्धिक परंपरा को आकार दिया - संस्कृत।
4. संस्कृत आखिर हाशिए पर क्यों पहुंच रही है? :
संस्कृत केवल एक भाषा नहीं है। यह भारतीय दर्शन, गणित, आयुर्वेद, साहित्य, व्याकरण और ज्ञान-विज्ञान की हजारों वर्षों पुरानी बौद्धिक परंपरा की आधारशिला है। भारतीय परंपरा में कहा गया है - संस्कृतं नाम दैवी वाक्।
फिर भी आज अनेक विद्यालयों में संस्कृत को गंभीर अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि परीक्षा पास करने का औपचारिक माध्यम मान लिया गया है।
संस्कृत को पाठ्यक्रम से पीछे धकेलना केवल एक विषय को कम करना नहीं, बल्कि पीढ़ियों को अपनी ज्ञान-संपदा से दूर करना है।
5. विदेशी भाषाएं प्रतिष्ठा और अपनी भाषाएं बोझ क्यों? :
शहरी भारत का एक बड़ा वर्ग बच्चों को कोडिंग कक्षाएं, रोबोटिक्स प्रयोगशालाएं और विदेशी भाषा संस्थान में भेजने को भविष्य की तैयारी मानता है। फ्रेंच, जर्मन या जापानी सीखना आधुनिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
लेकिन जब बात हिंदी, संस्कृत या अन्य भारतीय भाषाओं की आती है, तो वही समाज उसे अतिरिक्त बोझ मानने लगता है। यह विरोधाभास उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें विदेशीपन को प्रगति और अपनी भाषाओं को पिछड़ेपन से जोड़ दिया गया है।
गेटे ने कहा था - जो व्यक्ति दूसरी भाषा नहीं जानता, वह अपनी भाषा को भी पूरी तरह नहीं समझ सकता।
हम अपने बच्चों को दुनिया की भाषाएं सिखाना चाहते हैं, लेकिन अपनी सभ्यता की भाषा सिखाने में असहज हो जाते हैं।
6. शिक्षा संस्थानों की वास्तविक तस्वीर क्या है? :
देश के अनेक प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों में अंग्रेज़ी बोलना अनुशासन, श्रेष्ठता और आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है। कई स्थानों पर बच्चों को हिंदी में संवाद करने पर हतोत्साहित किया जाता है।
जहां ग्रामीण भारत में मातृभाषा अब भी शिक्षा और जीवन का स्वाभाविक माध्यम है, वहीं शहरी भारत का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी को सामाजिक सम्मान और सफलता का पर्याय मान चुका है।
जब भाषा संवाद का माध्यम न रहकर सामाजिक दर्जे का प्रतीक बन जाए, तब शिक्षा का चरित्र बदलने लगता है।
7. क्या बहुभाषी शिक्षा बच्चों को अधिक सक्षम बनाती है? :
अनेक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि अनेक भाषाएं सीखने वाले बच्चे अधिक रचनात्मक, विश्लेषणात्मक और संज्ञानात्मक रूप से अधिक सक्षम होते हैं। विकसित देशों ने अपनी भाषाओं को शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान का केंद्रीय माध्यम बनाकर ही बौद्धिक आत्मनिर्भरता हासिल की है।
जापान, जर्मनी, चीन और फ्रांस इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। भारत के सामने चुनौती यही है कि वह वैश्विक ज्ञान से जुड़ते हुए अपनी भाषाओं को भी ज्ञान-विज्ञान का माध्यम बनाए।
8. नई शिक्षा नीति क्या बदलना चाहती है? :
नई शिक्षा नीति-2020 ने स्पष्ट किया है कि विद्यार्थियों द्वारा चुनी गई तीन भाषाओं में कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं होंगी। महत्वपूर्ण यह है कि इसमें किसी विशेष भाषा को अनिवार्य नहीं बनाया गया है।
यह व्यवस्था अधिक लचीली, व्यावहारिक और लोकतांत्रिक है।
यह केवल भाषा नीति में सुधार नहीं, बल्कि भारत की भाषाई अस्मिता को पुनः केंद्र में लाने का प्रयास है।
9. विद्यार्थी और अभिभावक किस मानसिकता से गुजर रहे हैं? :
आज अनेक विद्यार्थियों को प्रारंभ से यह विश्वास दिलाया जाता है कि करियर, रोजगार और वैश्विक अवसर केवल अंग्रेज़ी से ही संभव हैं। कई अभिभावक विदेशी भाषा सीखने को निवेश मानते हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अध्ययन को समय की बर्बादी समझते हैं।
यहीं से भाषाई हीनभावना जन्म लेती है।
नेल्सन मंडेला ने कहा था - यदि आप किसी व्यक्ति से उसकी भाषा में बात करते हैं, तो आप उसके हृदय से बात करते हैं।
यदि विदेशी भाषा अवसर है, तो भारतीय भाषा बोझ कैसे हो सकती है?
10. भाषा संघर्ष नहीं, राष्ट्रीय संवाद बने :
भाषा किसी पर थोपी जाने वाली व्यवस्था नहीं, बल्कि समाजों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक शक्ति है। भारत की भाषाई विविधता तभी राष्ट्रीय शक्ति बनेगी जब उसमें प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और संवाद की भावना होगी।
भाषाएं दीवारें नहीं बनातीं; दीवारें तब बनती हैं जब समाज भाषा को राजनीति का हथियार बना देता है।
11. संस्कृत को बचाना भारत के भविष्य को बचाना है :
अंततः यह समझना होगा कि त्रिभाषा फार्मूला केवल शिक्षा नीति नहीं, बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक धारा को सुरक्षित रखने का प्रयास है जिसने हजारों वर्षों तक समाज को जोड़े रखा है।
श्री अरविन्द ने कहा था - जिस राष्ट्र की आत्मा जीवित रहती है, उसकी भाषा कभी मरती नहीं।
संस्कृत केवल एक विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा की ऐतिहासिक धुरी है। यदि भारत अपनी भाषाओं को केवल बाजार और रोजगार की दृष्टि से देखेगा, तो वह धीरे-धीरे अपनी सभ्यता की स्मृति खो देगा।
जो राष्ट्र अपनी भाषा को केवल उपयोगिता से मापता है, वह अंततः अपनी सभ्यता का मूल्य भूलने लगता है।
भारत का भविष्य केवल तकनीक से निर्मित नहीं होगा; वह उन भाषाओं से निर्मित होगा जिनमें उसकी सभ्यता ने हजारों वर्षों तक स्वयं को अभिव्यक्त किया है।
भारतीय भाषाओं को सम्मान देना केवल अतीत की रक्षा नहीं, भारत के भविष्य की रक्षा है।
12. संदर्भ सूची :
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(भारतीय शिक्षा व्यवस्था में त्रिभाषा सूत्र की मूल अवधारणा)
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (2024 - 25). विद्यालयी शिक्षा में भाषा शिक्षण एवं त्रिभाषा नीति संबंधी दिशा-निर्देश. नई दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड।
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रवीन्द्रनाथ ठाकुर. शिक्षा, भाषा और संस्कृति विषयक निबंध-संग्रह.
(भाषा को सभ्यता की चेतना के रूप में समझने का दार्शनिक आधार)
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(राष्ट्र, संस्कृति और भाषा के संबंध पर वैचारिक दृष्टि)
भारतीय भाषाओं, मातृभाषा-आधारित अधिगम, बहुभाषी शिक्षा, संज्ञानात्मक विकास तथा भाषा-मनोविज्ञान से संबंधित प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय शोध-अध्ययन एवं शिक्षा-विज्ञान संबंधी अकादमिक शोधपत्र।
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