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शिक्षा : अंकों का डर : गणित-भय, आत्मविश्वास और बच्चों का भविष्य

Abhyuday Bharat News / Thu, Jun 11, 2026 / Post views : 12

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गणित के बढ़ते भय के बीच डगमगाता आत्मविश्वास, सीमित होती संभावनाएँ और सीखने की संस्कृति पर उठते गंभीर प्रश्न

✍ डॉ. भूपेन्द्र धर दीवान

शिक्षा-विचारक, मानसिकमाप परामर्शदाता एवं बहु-बुद्धिमत्ता अध्ययन विशेषज्ञ

1. जब प्रश्नपत्र से पहले भय शुरू हो जाता है :

बुढीखार बिलासपुर की कक्षा नवमी की एक छात्रा गणित में औसत से बेहतर थी। वह कक्षा में प्रश्नों के उत्तर दे लेती थी, गृहकार्य भी पूरा करती थी, लेकिन परीक्षा का नाम सुनते ही उसके हाथ काँपने लगते थे। कई बार उसे उत्तर पता होते हुए भी वह उन्हें लिख नहीं पाती थी। कुछ महीनों तक सकारात्मक प्रोत्साहन, त्रुटियों को सीखने के अवसर के रूप में स्वीकार करने और सहयोगात्मक शिक्षण वातावरण मिलने के बाद उसके अंक ही नहीं, उसका आत्मविश्वास भी सुधर गया।

यह केवल एक छात्रा की कहानी नहीं है। यह उन लाखों बच्चों की कहानी है जो गणित से नहीं, बल्कि गणित से जुड़े भय से जूझ रहे हैं। यह भय केवल परीक्षा परिणामों को प्रभावित नहीं करता, बल्कि बच्चे की आत्म-छवि, सीखने की प्रेरणा और भविष्य की संभावनाओं को भी सीमित कर सकता है।

“प्रकृति की महान पुस्तक गणित की भाषा में लिखी गई है।”

— गैलीलियो गैलीली

विडंबना यह है कि जिस भाषा ने विज्ञान, तकनीक और आधुनिक सभ्यता को आकार दिया, उसी भाषा से आज असंख्य बच्चे भयभीत दिखाई देते हैं।

2. गणित-भय : दुनिया भर के बच्चों की अदृश्य चुनौती

इक्कीसवीं सदी में गणित केवल एक विद्यालयी विषय नहीं रह गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विज्ञान, रोबोटिक्स, वित्तीय प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक अनुसंधान की पूरी दुनिया गणितीय सोच पर आधारित है। इसके बावजूद गणित विद्यालयों में सबसे अधिक चिंता उत्पन्न करने वाले विषयों में शामिल है।

गणित-भय या मैथ एंग्ज़ायटी केवल विषयगत कठिनाई नहीं है। यह एक मनोवैज्ञानिक अवस्था है जिसमें गणित से जुड़ी परिस्थितियाँ तनाव, असुरक्षा और आत्म-संदेह को जन्म देती हैं। अनेक शोध संकेत देते हैं कि यह स्थिति बच्चे की वास्तविक क्षमता और उसके प्रदर्शन के बीच दूरी पैदा कर सकती है।

3. मस्तिष्क का विज्ञान : जब भय सीखने पर हावी हो जाता है

आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान बताता है कि सीखना और भावनाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जब कोई बच्चा भय या तनाव की स्थिति में होता है, तब उसकी कार्यशील स्मृति प्रभावित होती है। यही स्मृति समस्या-समाधान, तार्किक चिंतन और निर्णय क्षमता का आधार होती है।

फलस्वरूप बच्चा वही प्रश्न हल नहीं कर पाता जिन्हें वह सामान्य परिस्थितियों में आसानी से हल कर सकता था। इस प्रकार कई बार समस्या गणित नहीं, बल्कि गणित के प्रति विकसित हुआ भय होता है।

4. डर की जड़ें : विषय में नहीं, अनुभवों में

गणित-भय जन्मजात नहीं होता; यह अनुभवों से निर्मित होता है। बार-बार की तुलना, गलती पर उपहास, अंकों का अत्यधिक दबाव, परीक्षा-केंद्रित शिक्षण और “गणित बहुत कठिन है” जैसी धारणाएँ बच्चों के मन में नकारात्मक विश्वास पैदा कर देती हैं।

जब सीखने की प्रक्रिया आनंद और जिज्ञासा से कट जाती है, तब गणित एक खोज की यात्रा न रहकर भय का विषय बन जाता है।

5. आत्मविश्वास का क्षरण : गणित से आगे की कहानी

गणित-भय का सबसे गंभीर प्रभाव बच्चों के आत्मविश्वास पर पड़ता है। धीरे-धीरे बच्चा स्वयं को कम सक्षम मानने लगता है। यह सोच केवल गणित तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवन के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करती है।

वह नए अवसरों से बचने लगता है, प्रश्न पूछने में संकोच करता है और चुनौतियों का सामना करने के बजाय उनसे दूरी बनाने लगता है।

“हमें सबसे अधिक डर स्वयं डर से ही होना चाहिए।”

— फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट

बच्चों का भविष्य उनके अंकों से कम और उनके आत्मविश्वास से अधिक तय होता है।

यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।

6. अंकों की संस्कृति बनाम सीखने की संस्कृति

आज शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—अंकों को उपलब्धि का अंतिम मानक मान लेना। जब बच्चे केवल अंक प्राप्त करने के लिए पढ़ते हैं, तब जिज्ञासा, प्रयोग और रचनात्मकता की भावना पीछे छूट जाती है।

गणित, जो मूलतः तर्क, पैटर्न और समस्या-समाधान का विषय है, कई बार केवल सही उत्तर देने की प्रतियोगिता बनकर रह जाता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्तर देना नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करना भी होना चाहिए।

7. तथ्य-खिड़की : गणित-भय के सामान्य संकेत

• गणित की कक्षा या परीक्षा से पहले अत्यधिक घबराहट।

• सरल प्रश्नों में भी आत्म-संदेह।

• गणित से संबंधित गतिविधियों से बचने की प्रवृत्ति।

• “मैं गणित में कमजोर हूँ” जैसे नकारात्मक आत्म-वाक्य।

• तैयारी होने के बावजूद अपेक्षित प्रदर्शन न कर पाना।

8. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में गणित का नया अर्थ :

आज प्रश्न यह नहीं है कि बच्चा कितनी तेजी से गणना कर सकता है। प्रश्न यह है कि क्या वह तर्क कर सकता है, डेटा को समझ सकता है, पैटर्न पहचान सकता है और जटिल समस्याओं के समाधान खोज सकता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में गणित केवल एक विषय नहीं, बल्कि सोचने का एक तरीका है। भविष्य के अधिकांश रोजगार सूचना के संग्रह से नहीं, बल्कि सूचना के विश्लेषण और उपयोग की क्षमता से निर्धारित होंगे।

9. गणित : अवसरों और भविष्य की नई भाषा

विज्ञान, प्रौद्योगिकी, वित्त, अनुसंधान और नवाचार—लगभग हर क्षेत्र में गणितीय सोच की आवश्यकता बढ़ रही है। इसलिए गणितीय दक्षता केवल शैक्षणिक सफलता का नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अवसरों का भी आधार बनती जा रही है।

इस दृष्टि से गणित-भय केवल व्यक्तिगत चुनौती नहीं, बल्कि मानव संसाधन विकास, नवाचार क्षमता और राष्ट्रीय प्रगति का भी प्रश्न है।

10. समाधान : डर नहीं, संवाद की आवश्यकता

गणित-भय का समाधान अधिक दबाव में नहीं, बल्कि बेहतर सीखने के वातावरण में निहित है। बच्चों को यह अनुभव होना चाहिए कि गलती करना असफलता नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक चरण है।

माता-पिता और शिक्षकों को तुलना के बजाय प्रोत्साहन, भय के बजाय संवाद और परिणाम के बजाय सीखने की प्रक्रिया को महत्व देना चाहिए। गणित को खेल, गतिविधियों, परियोजनाओं और वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर अधिक जीवंत और अर्थपूर्ण बनाया जा सकता है।

11. निष्कर्ष : जब गणित आत्मविश्वास की भाषा बन जाए

“हर सकारात्मक पूर्णांक मेरा मित्र है।” — श्रीनिवास रामानुजन

गणित-भय बच्चों की कमजोरी नहीं, बल्कि हमारे शैक्षिक और सामाजिक परिवेश का प्रतिबिंब है। यदि हम शिक्षा को अंकों की संकीर्ण परिभाषा से मुक्त कर सकें और जिज्ञासा, तर्क तथा रचनात्मकता को उसका केंद्र बना सकें, तो गणित भय का नहीं, संभावनाओं का विषय बन जाएगा।

गणित का भविष्य केवल बेहतर पाठ्यपुस्तकों, नए पाठ्यक्रमों या आधुनिक तकनीकों से नहीं बनेगा। वह ऐसे सीखने के वातावरण से बनेगा जहाँ जिज्ञासा को अंकतालिका से अधिक महत्व मिले, जहाँ गलती को विफलता नहीं बल्कि सीखने का अवसर माना जाए, और जहाँ प्रत्येक बच्चा स्वयं को सक्षम महसूस कर सके।

क्योंकि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति केवल उसके अंकों से नहीं, बल्कि उसके बच्चों के आत्मविश्वास, जिज्ञासा और समस्या-समाधान की क्षमता से तय होती है।

जब बच्चे गणित से डरना छोड़ देते हैं, तभी वे भविष्य को गढ़ना सीखते हैं।

“बच्चों का भविष्य उनके अंकों से कम और उनके आत्मविश्वास से अधिक तय होता है।”

क्योंकि अंततः गणित का सबसे कठिन सवाल प्रश्नपत्र में नहीं, बच्चों के आत्मविश्वास में छिपा होता है।

12. संदर्भ एवं अनुशंसित अध्ययन :

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी)। (2024)। पीसा 2022 परिणाम : अधिगम के प्रति विद्यार्थियों की प्रवृत्तियाँ। पेरिस : ओईसीडी प्रकाशन।

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी)। (2023)। पीसा 2022 परिणाम : शिक्षा में अधिगम और समानता की स्थिति। पेरिस : ओईसीडी प्रकाशन।

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी)। (2015)। क्या गणित आपको चिंतित करता है? (पीसा इन फोकस, अंक 48)। पेरिस : ओईसीडी प्रकाशन।

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को)। (2021)। हमारे साझा भविष्य की पुनर्कल्पना : शिक्षा के लिए नया सामाजिक अनुबंध। पेरिस : यूनेस्को प्रकाशन।

डेनेस स्यूक्स। (2019)। गणित-भय की उत्पत्ति और उसके समाधान। जिनेवा : अंतरराष्ट्रीय शिक्षा ब्यूरो (आईबीई–यूनेस्को)।

सियान एल. बीलॉक। (2011)। दबाव की परिस्थितियों में सही प्रदर्शन का विज्ञान। न्यूयॉर्क : फ्री प्रेस।

जो बोएलर। (2016)। गणितीय मानसिकता : विद्यार्थियों की क्षमता और रचनात्मकता को विकसित करने की नई दृष्टि। सैन फ्रांसिस्को : जोसी-बास प्रकाशन।

कैरल एस. ड्वेक। (2006)। मानसिकता : सफलता का नया मनोविज्ञान। न्यूयॉर्क : रैंडम हाउस।

ए. ई. फोली एवं सहयोगी। (2017)। गणित-भय और शैक्षणिक प्रदर्शन का संबंध : एक वैश्विक अध्ययन। मनोवैज्ञानिक विज्ञान की समकालीन दिशाएँ।

राष्ट्रीय गणित शिक्षक परिषद। (2023)। सभी के लिए गणितीय सफलता : सिद्धांत और कार्यनीतियाँ। वर्जीनिया, अमेरिका।

श्रीनिवास रामानुजन पर आधारित विभिन्न जीवनी एवं गणितीय अध्ययन ग्रंथ।

गणित-भय, अधिगम-मनोविज्ञान, आत्म-प्रभावकारिता तथा बाल-विकास से संबंधित समकालीन शोध-पत्र एवं अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक अध्ययन।

समाचार संकलन : अनिल बघेल ABN

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